घर में कौन से स्थान पर किस प्रकार का निर्माण होना चाहिए। चार मुख्य दिशाएं होती है और 4 उप दिशाएं होती है इस प्रकार से कुल 8 दिशाएं होती है। पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर ये चार मुख्य दिशाएं है। ईशान, अग्नि, नैऋत्य और वायु ये 4 उप दिशाएं होती है। यदि घर का ईशान कोण सही हो तो बहुत सा वास्तु दोष तो वैसे ही दूर हो जाता है। आइए हम ईशान कोण से ही प्रारंभ करते हैं।
ईशान कोण में मंदिर बनाए। ध्यान कक्ष बनाए। बरामदा बनाना हो तो ईशान कोण में अच्छा रहता है। प्रवेश द्वार भी बनाया जा सकता है। बालकनी ईशान कोण में अच्छी रहती है। भूमिगत पानी की टंकी अर्थात् अंडर ग्राउंड वाटर टैंक यहां पर बनाना चाहिए। ट्यूबवेल भी बनाना चाहिए।
ईशान कोण मैं टॉयलेट, रसोई घर और सेप्टिक टैंक भूल कर भी नहीं होना चाहिए। इनका दुष्प्रभाव होता है।
बात करते हैं पूर्व दिशा की। पूर्व दिशा में अध्ययन कक्ष हो सकता है। बैठक अर्थात् ड्राइंग रूम हो सकता है। स्नानघर भी हो सकता है। यथासंभव पूर्व दिशा में खुला स्थान रखें।
अग्नि कोण की बात करते हैं। अग्नि कोण में रसोई घर बनाए। रसोई का स्टोर हो सकता है। तुलसी का पौधा भी यहां लग सकता है। बिजली का मीटर, इनवर्टर, जनरेटर आदि यहां पर लगाएं।
अग्नि कोण में कुआं या तहखाना बिल्कुल भी न बनवाएं। यहां पर अंडरग्राउंड बनाने से दुष्प्रभाव होता है।
दक्षिण दिशा की बात करते हैं। दक्षिण दिशा में सीढियां बनवाई जा सकती है। स्टोर रूम यहां पर हो सकता है। बेडरूम अर्थात् शयनकक्ष यहां पर हो सकता है।
दक्षिण दिशा में कुआ व तहखाना किसी भी हालत में न बनवाएं।
नैऋत्य कोण में मुखिया का शयनकक्ष अर्थात् मास्टर बैडरूम होता है। यहां पर भारी सामान रखें। यहां पर सीढियां बनाई जा सकती है। कपड़े रखने की अलमारी, तिजोरी और श्रृंगार कक्ष संबंधित सामान यहां पर रखा जा सकता है।
इस दिशा में कुआ व अंडर ग्राउंड भूलकर भी न बनाएं।
पश्चिम दिशा में भोजन कक्ष अर्थात् डाइनिंग रूम बनाए। अध्ययन कक्ष व बच्चों का शयनकक्ष भी यहां पर हो सकता है। इस दिशा में छत पर पानी की टंकी रखें या ऊंची बनाए। टॉयलेट और सेप्टिक टैंक भी इस दिशा में बनाया जा सकता है। इस दिशा में कुआ व अंडरग्राउंड न बनाएं।
वायु कोण की बात करते हैं। वायव्य कोण में अन्न भंडार होना चाहिए। यहां पर पशु स्थान होता है। कोई भी पशु गाय, भैंस आदि रखना हो तो यहां पर रखें। यहां पर सेफ्टी टैंक भी बनाया जा सकता है। ड्राइंग रूम भी यहां पर होता है। वायव्य कोण में टॉयलेट भी बनाया जा सकता है। यहां पर पार्किंग बनाई जाती है अर्थात् वाहन खड़े करने की जगह होती है। यहां पर भोजन कक्ष भी बनाया जा सकता है।
उत्तर दिशा में प्रवेश द्वार हो सकता है। ड्राइंग रूम भी हो सकता है। उत्तर दिशा कुबेर जी की दिशा होती है। अतः यहां पर तिजोरी होती है व धन रखा जाता है। इस दिशा में खुला स्थान रखें। स्नानघर भी इस दिशा में हो सकता है।
उत्तर दिशा में शयनकक्ष ना बनाएं।
अब बात करते हैं मध्य स्थान की। इसे ब्रह्म स्थान कहते हैं। इसको यथासंभव खुला रखें। इस स्थान में तुलसी का पौधा लगाया जा सकता है। यह स्थान रोशनी वाला व हवादार होना चाहिए। इस स्थान को साफ सुथरा रखना चाहिए।
इस प्रकार से वास्तु शास्त्र के अनुसार निर्माण करना चाहिए।