2025 diwali date | 2025diwali kab hai | diwali 2025
श्रीमद्भागवत और विष्णुधर्मोत्तर पुराण के अनुसार समुद्र मंथन से कार्तिक महीने की अमावस्या पर लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। इसके बाद लक्ष्मी पूजन की परंपरा शुरू हुई।
ब्रह्म पुराण की कथा के अनुसार महाराज पृथु ने पृथ्वी दोहन कर इसे धन-धान्य से समृद्ध बनाया, इसलिए दीपावली मनाते हैं।
मार्कंडेय पुराण के अनुसार जब पृथ्वी पर केवल अंधेरा था तब एक तेज प्रकाश के साथ कमल पर बैठी देवी प्रकट हुईं थी जो लक्ष्मी थी। उनके प्रकाश से ही संसार बना इसलिए इस दिन लक्ष्मी पूजा की परंपरा हैं। वहीं, श्रीराम के अयोध्या लौटने के स्वागत में दीपावली मनाने की परंपरा है।
एक अहोरात्र में 8 प्रहर होते है जिसमे 4 प्रहर दिन के व 4 प्रहर रात्रि के होते है। प्रत्येक स्थान में सूर्यास्त का समय भिन्न होता है इसलिए प्रदोष काल में भिन्नता पायी जाती है। प्रदोष काल निर्धारण के सम्बन्ध में अलग-अलग मत है। एक मतानुसार सूर्यास्त के 72 मिनट पहले से और 72 मिनट बाद तक प्रदोष काल माना जाना चाहिए। हम यहाँ पर इसी एक मत की बात कर रहे हैं। एक अहोरात्र में 60 घटी होती है। एक अहोरात्र में कुल 30 मुहूर्त होते है जिनमे दिन के 15 व रात्रि के 15 मुहूर्त होते है। 1 मुहूर्त 2 घटी का होता है, अर्थात 48 मिनट का होता है। अतः 1 ½ मुहूर्त 72 मिनट का सूर्यास्त से पहले व 1 ½ मुहूर्त 72 मिनट का सूर्यास्त के बाद, इस प्रकार कुल 3 मुहूर्त प्रदोषकाल होता है। इस प्रकरण में अमावस्या प्रदोष में त्रिमुहूर्त व्यापिनी होनी चाहिए।
हम दिल्ली के प्रदोषकाल में अमावस्या को देखते हैं।
अमावस्या तिथि प्रारंभ 20 अक्टूबर को 3:44 pm के बाद।
अमावस्या तिथि समाप्त 21 अक्टूबर को 5:54 pm पर।
सूर्यास्त होगा 05:46 pm बजे।
प्रदोष काल – सूर्यास्त समय में 72 मिनट घटाने पर, 5:46 – 72 मिनट= 4:34 pm से प्रारंभ।
सूर्यास्त के बाद के प्रदोष काल के 72 मिनट जोड़ने पर 5:46 + 72 = 6:58 बजे तक।
20 अक्टूबर को अमावस्या तिथि प्रदोषकाल के प्रारंभ होने के पहले से ही है। अतः त्रिमुहूर्त्त व्यापिनी है। यह सम्पूर्ण रात्रिकाल में है।
21 अक्टूबर को अमावस्या 05:54 pm तक ही है। अतः त्रिमुहूर्त्त व्यापिनी नहीं है। रात्रिकाल में नहीं है।
हस्त नक्षत्र होगा 20 अक्टूबर को 8:17 pm तक। उसके बाद चित्रा नक्षत्र रहेगा।
20 अक्टूबर 2025 को अमावस्या 3:44 pm से प्रारंभ होगी व पूरी रात्रि में रहेगी। अतः अमावस्या रात्रिकाल में 20 अक्टूबर की रात्रि में ही प्राप्त होंगी।
लक्ष्मी पूजन कार्त्तिक अमावस्या की रात्रिकाल का पर्व है।
प्रदोषकाल में त्रिमुहूर्त्त व्यापिनी कार्त्तिक अमावस्या को दीपपूजन का विधान है। रात्रिकाल में लक्ष्मी पूजन करने का निर्देश है।
21 अक्टूबर को सूर्यास्त 05:45 pm पर है। अमावस्या 5:54 pm तक है। अर्थात सूर्यास्त के बाद केवल 9 मिनट तक ही है। यह प्रदोषकाल में त्रिमुहूर्त व्यापिनी नहीं है।
अतः 20 अक्टूबर 2025 को दीपपूजन व लक्ष्मी पूजन का पर्व मनाना चाहिए।
हम इतना ध्यान रखेंगे कि दिवाली दीपमालिका का त्योंहार है जो श्री राम के अयोध्या लौटने की खुशी में दीयों का प्रकाश कर मनाया जाता है। लक्ष्मी पूजा या काली पूजा एक साधना है, एक पूजा है जो कार्तिक अमावस्या की रात्रि में की जाती है। ये दो अलग अलग पूजा है:
दीपमालिका पूजन– भगवान श्री राम के युद्ध विजय कर अयोध्या लौटने की खुशी में कार्तिक अमावस्या को प्रदोषकाल में।
लक्ष्मी या काली पूजन– कार्तिक अमावस्या को प्रदोषकाल से लेकर रात्रि में विभिन्न मुहूर्त व लग्नानुसार।
दिवाली पूजन कब किया जाना चाहिए इसके जो नियम बताये गये हैं वे दीपमालिका पूजन के लिए है। इनमे लक्ष्मी पूजन के मुहूर्त लग्नादि का उल्लेख नहीं है। लक्ष्मी पूजन के अलग नियम है। आज के समय में मनुष्य लक्ष्मी पूजन को ही प्रधानता देता है अतः इन नियमों को लक्ष्मी पूजन के नियम मान लेता है जबकि ये नियम व शास्त्राज्ञा दिवाली पूजन अर्थात दीपमालिका पूजन के लिए है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दिवाली का त्योंहार अर्थात दीपमालिका का त्योंहार।
अतः अमावस्या 20 अक्टूबर 2025 को सम्पूर्ण रात्रि में है।
अतः लक्ष्मी व काली पूजन 20 अक्टूबर की रात्रि को ही करना चाहिए।
दीपमालिका प्रज्ज्वलन व पूजन भी 20 अक्टूबर को प्रदोषकाल में करना चाहिए। व्यापारिक प्रतिष्ठानों में लक्ष्मी पूजन यदि दिन में करना हो तो 21 अक्टूबर को अमावस्या के रहते अर्थात 5:54 pm तक कर सकते है परंतु सर्वोत्तम 20 अक्टूबर को प्रदोष से लेकर रात्रिकाल में ही रहेगा।
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लक्ष्मी पूजासोमवार, अक्टूबर 20, 2025 को विभिन्न मुहूर्त:-
How will married life be? | वैवाहिक जीवन कैसा रहेगा?
Marriage linesविवाह रेखाएं
हथेली के किनारे पर बुध पर्वत के नीचे और हृदय रेखा के पास जो आड़ी रेखाएं होती है उनको विवाह या प्रेम संबंध रेखाएं कहा जाता है।
आईए जानते हैं विवाह रेखाएं कितने प्रकार की होती है:-
-यदि हथेली में छोटी व अस्पष्ट हो तो व्यक्ति को विवाह के प्रति कोई आकर्षण नहीं रहता है या ऐसे व्यक्ति का विवाह कम समय तक चलता है।
-यदि विवाह रेखा लंबी और स्पष्ट हो तो व्यक्ति का वैवाहिक जीवन लंबा चलेगा और वह अपने जीवनसाथी के साथ मधुर संबंध रखेगा
– हथेली में यदि एक ही विवाह रेखा हो तो यह अच्छे और मधुर वैवाहिक जीवन को बताती है।
– यदि एक से अधिक विवाह रेखाएं हो तो व्यक्ति के विवाह के अलावा भी संबंध होते हैं या एक से अधिक विवाह हो सकते हैं।
– यदि विवाह रेखा सीधी हो स्पष्ट हो तो यह संकेत देती है कि व्यक्ति का वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा और दीर्घकाल तक चलेगा।
– यदि विवाह रेखा का झुकाव हृदय रेखा की तरफ हो तो जीवनसाथी के प्रति प्रेम का संकेत होता है और सुखी वैवाहिक जीवन होता है।
– यदि विवाह रेखा नीचे की ओर झुकी हुई हो अर्थात उंगलियों की ओर झुकी हुई हो तो यह वैवाहिक जीवन में कष्ट देता है मतभेद व झगड़े देता है।
– यदि विवाह रेखा पर क्रॉस का चिन्ह हो तो विवाह में मुश्किलें आती है और कठिनाई से विवाह संपन्न होता है।
– यदि विवाह रेखा में जंजीर की आकृति बनी हो तो विवाह विलंब के पश्चात होता है और वैवाहिक जीवन सुखी भी नहीं रहता है।
– यदि विवाह रेखा में द्वीप का निशान हो तो जीवनसाथी से झगड़ा व अलगाव होता है तलाक भी हो सकता है।
– यदि विवाह रेखा हृदय रेखा की ओर मुड़ जाए या उसको काटकर आगे निकल जाए तो प्रेम विवाह होता है।
– यदि विवाह रेखा के साथ कोई रेखा समानांतर चले तो भी प्रेम विवाह होता है।
– विवाह रेखा यदि टूटी हुई हो या दो भागों में विभाजित हो तो अरेंज मैरिज होती है और तनाव भी होता है।
– यदि हृदय रेखा टूटी हुई हो या धुंधली हो, अंगूठे के पास से कोई धुंधली रेखा निकलती हो तो अरेंज विवाह होता है।
– सबसे छोटी उंगली अर्थात बुध पर्वत के पास तथा मंगल पर्वत के पास अनेक रेखाएं हो तो वैवाहिक जीवन में काफी परेशानियाँ आती है।
– यदि विवाह रेखा आगे से दो भागों में बटी हुई हो तो यह तलाक करवा सकती है।
– यदि टूटी-फूटी विवाह रेखा हो तो प्रेम संबंध में परेशानियां आती है बार-बार अलगाव की स्थितियां आती है।
– यदि विवाह रेखा सूर्य रेखा को छूती हो तो वैवाहिक संबंध धनी परिवार में होता है।
– यदि विवाह रेखा में से एक शाखा निकलकर सूर्य रेखा की ओर जाए तो व्यक्ति का विवाह समाज में प्रसिद्ध व्यक्ति से होगा।
– यदि विवाह रेखा आगे बढ़कर सूर्य रेखा को काटे तो व्यक्ति विवाह के पश्चात पद और प्रतिष्ठा में हानि होती है।
– चंद्र पर्वत से कोई रेखा निकलकर भाग्य रेखा में मिले तो व्यक्ति का ससुराल धनी परिवार में होता है और ससुराल से सहयोग भी मिलता है।
– यदि मंगल पर्वत से कोई रेखा निकलकर मस्तिष्क, भाग्य और हृदय रेखा को काटते हुए बुध पर्वत पर अर्थात कनिष्टिका अंगुली पर जाकर समाप्त होती है तो विवाह में विच्छेद हो सकता है या हमेशा वैवाहिक जीवन कटुता पूर्ण होता है।
– जिनकी विवाह रेखा पतली और महीन होती है उनका वैवाहिक जीवन के प्रति कोई उत्साह नहीं होता है।
– स्पष्ट विवाह रेखा से कई रेखाएं निकाल कर हृदय रेखा की ओर जाती हो तो जीवनसाथी का स्वास्थ्य खराब होता है तथा वैवाहिक जीवन में झगड़े होते हैं।
– यदि विवाह रेखा के आरंभ में दो शाखाएं हो तो विवाह टूटकर दूसरा विवाह होता है।
– गहरी और गुलाबी रेखा वैवाहिक जीवन में मधुरता लाती है।
– हृदय रेखा और कनिष्ठिका अंगुली के बीच को 50 वर्ष मानकर जहां लंबी रेखा हो उसको विवाह रेखा माने और उसी अनुपात में विवाह की आयु निर्धारित करें।
– कनिष्टिका अंगुली और हृदय रेखा के पास छोटी-छोटी खड़ी रेखाएं हो तो वैवाहिक संबंध तय होने के बाद टूट सकता है।
– विवाह रेखा आगे दो भागों में बँटकर पुनः एक दूसरे को दोनों शाखाएं काटे तो कोर्ट के द्वारा तलाक हो सकता है।
यदि किसी लड़की या लड़के के विवाह में विलंब हो रहा है या बाधायें आ रही है, संतान प्राप्ति में बधायें आ रही है तो इसके कई कारण हो सकते हैं। यदि जन्म कुंडली में विशेष दोष हो तो विशेष उपाय से ही निवारण हो सकता है। तो क्या उपाय करना चाहिए? इस प्रश्न के उत्तर में एक विशेष प्रयोग के बारे में चर्चा करेंगे जिसका नाम है हरिद्रा गणपती मंत्र प्रयोग। इस मंत्र की पुरश्चरण संख्या अधिक है परंतु यह सरल साधना है और फलदायक है। आप इसे आसानी से सम्पन्न कर सकते है।
इस मंत्र की साधना के लिए उचित मुहूर्त गुरु-पुष्य, रवि –पुष्य, अमृत सिद्धि योग ले सकते हैं। आप भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि से प्रारंभ कर भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तक भी यह प्रयोग सम्पन्न कर सकते है। स्वयं यदि नहीं जानते हैं तो उचित गुरु के मार्गदर्शन में यह प्रयोग करना चाहिए। इस मंत्र की साधना करने से पहले आपको धूप, दीप, गणपती, कलश, षोडश मातृका आदि का पूजन कर लेना चाहिए। उसके बाद गणपति या सर्वतोभद्र मण्डल का पूजन करें। पात्रासादन कर लें। विशेष अर्घ्य पात्र की भी स्थापना कर लें। मण्डूकादि परतत्त्वान्त पीठदेवताओं की स्थापना करके उस पर कलश रखें व उसका पूजन करें। कलश पर हरिद्रा गणपती यंत्र की स्थापना करें। सोने की गणपती की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कर यंत्र पर स्थापित करें।
‘ॐ मं मण्डूकादि परतत्त्वान्त पीठदेवताभ्यो नमः’ इससे पूजा करके नवपीठशक्तियों की इस प्रकार पूजा करे:
पूर्व दिशा से प्रारंभ करते हुए पूजन करें:-
ॐ तीव्रायै नमः
ॐ चालिन्यै नमः
ॐ नन्दायै नमः
ॐ भोगदायै नमः
ॐ कामरूपिण्यै नमः
ॐ उग्रायै नमः
ॐ तेजोवत्यै नमः
ॐ सत्यायै नमः
मध्य में ॐ विघ्ननाशिन्यै नमः।
इस प्रकार पूजा करे। इसके बाद स्वर्णादि से निर्मित यन्त्र या मूर्ति को ताम्रपात्र में रखकर घृत से उसका अभ्यङ्ग करके उसके ऊपर दूध की धारा और जल की धारा डाल कर स्वच्छ वस्त्र से उसे पोछ कर
‘ह्रीं सर्वशक्ति कमलासनाय नमः’
इस मन्त्र से पुष्प आदि का आसन देकर पीठ के बीच स्थापित करके और प्रतिष्ठा करके पाद्यादि पुष्पान्त उपचारों से पूजा करें।
हरिद्रागणेश मन्त्र इस प्रकार है: ॐ हुंगंग्लों हरिद्रागणपतये वर वरद सर्वजनहृदयं स्तम्भय स्तम्भय स्वाहा। इति द्वात्रिंशदक्षयो मन्त्रः ।
यह 32 अक्षरों का मन्त्र है।
पहले विनियोग करें:
अस्य हरिद्रागणनायकमन्त्रस्य मदन ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । हरिद्रागणनायको देवता ममाभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः।
यह पढ़कर और पुष्पाञ्जलि देकर ‘पूजितास्तर्पिता संतु’ यह कहें। इस प्रकार आज्ञा लेकर यंत्र के षट्कोणकेसरों में आग्नेयादि चारों दिशाओं और मध्य दिशा में इस प्रकार से पूजन व तर्पण करें।
इस प्रकार षडङ्गोंकी पूजा करके पुष्पाञ्जलि लेकर “ॐ हुंगंग्लों हरिद्रागणपतये वर वरद सर्वजनहृदयं स्तम्भय स्तम्भय स्वाहा।“ मूलमन्त्रका उच्चारण करके :
‘अभीष्टसिद्धिम् में देहि शरणागतवत्सल।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम् ॥
यह पढ़कर पुष्पाब्जलि देकर विशेषार्घ्य से जल बिन्दु डाल कर ‘पूजितास्तर्पिताः सन्तु’ यह कहे। इति प्रथमावरण ॥
इसके बाद पूज्य और पूजक के अन्तराल को प्राची तथा तदनुसार अन्य दिशाओं की कल्पना करके दाहिने हाथ की तर्जनी और अंगूठे से गन्ध-अक्षत-पुष्प लेकर प्राची क्रम से आठों दिशाओं में:
इससे आठों की पूजा करे। फिर पुष्पांजलि लेकर मूलमन्त्र का उच्चारण करके :
‘अभीष्टसिद्धिम् में देहि शरणागतवत्सल।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं तृतीयावरणार्चनम् ॥
यह पढ़कर और पुष्पांजलि देकर विशेषार्घ्य से जल बिन्दु डाल कर ‘पूजितास्तर्पिताः सन्तु’ यह कहे। इति तृतीयावरण ॥
इसके बाद भूपुर में पूर्वादि क्रम से इन्द्रादि दश दिक्पालों और वज्रादि आयुधों की पूजा करें। इस प्रकार आवरण पूजा करके धूपादि से नमस्कार पर्यन्त पूजा करके जप करें।
इसका पुरश्चरण चार लाख जप है। हल्दी मिश्रित घृत और चावल से दशांश होम तथा तत्दशांश तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण भोजन कराएं। इस प्रकार करने से मन्त्र सिद्ध हो जाता है। मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर साधक प्रयोगों को सिद्ध करें। चार लाख जप पूरा होने पर हल्दी के चूर्ण से मिश्रित चावलों से दशांश हवन करना चाहिये और फिर क्रमशः तर्पण, मार्जन एवं बाह्मण भोजन कराने से पुरश्चरण पूरा तथा मन्त्र सिद्ध हो जाता है। मन्त्र सिद्ध हो जाने पर साधकों को मनोरथ सिद्ध करना चाहिये।
शुक्लपक्ष की चतुर्थी को कन्या के द्वारा पीसी हल्दी का शरीर में लेप कर (तीर्थादि के) जल से स्नान कर गणेशजी का पूजन करना चाहिये । फिर तर्पण कर उनके सम्मुख 1008 जप करना चाहिये। घी एवं मालपुआ से 100 आहुतियाँ देकर ब्रह्मचारियों को भोजन कराना चाहिये। कुमारियों एवं अपने गुरु को सन्तुष्ट कर साधक मनोवाञ्छित फल प्राप्त करता है।
लाजाओं के होम से वधू प्राप्त होती है तथा कन्या को भी अनुरूप वर मिलता है।
वन्ध्या स्त्री ऋतुस्नान करके गणेशजी का पूजन कर 4 तोला गोमूत्र में दुधवच एवं हल्दी पीस कर 1000 मन्त्रों से अभिमन्त्रित करें। फिर कन्या एवं बटुकों को मोदक खिलाकर उस औषधि को पीकर गुणवान पुत्र प्राप्त करती है।
इस मन्त्र की उपासना से वाणी स्तम्भन एवं शत्रु स्तम्भन होता है।
जल, अग्नि, चौर, सिंह एवं अस्त्र आदि के प्रकोप को भी इससे रोका जा सकता है।
अन्य मंत्र:-
शार्ङ्गी (ग) एवं मांसस्थित (ल) में अनुस्वार लगाने से हरिद्रा-गणपति का बीजमन्त्र (ग्लं) बतलाया गया है। इस मन्त्र का पुरश्चरण पूर्वोक्त रीति से करना चाहिये ।
पुरश्चरणविधिः इस प्रकार ध्यान करके मानसोपचारों से पूजन कर
विधिवत् शङ्खस्थापन, पीठपूजा, तीव्रादि शक्तियों का पूजन, अङ्गपूजा एवं आवरण पूजा आदि समस्त कार्य पूर्वोक्त रीति के अनुसार करने चाहिये । इस प्रकार 4 लाख जप करे। घी, मधु, शर्करा एवं हरिद्रा मिश्रित चावलों से दशांश होम करना चाहिये। फिर तत्दशांश तर्पण, मार्जन एवं ब्राह्मण भोजन करने से पुरश्चरण पूर्ण होता है। उसके बाद काम्य प्रयोग करें।
इस प्रकार मनोभीष्ट फल देनेवाले ये गणेशजी के मन्त्र बताये गये हैं। दुर्जनों से ये मन्त्र गुप्त रखने चाहिये तथा उन्हें कभी भी नहीं बतलाना चाहिये ।
साधना के क्रम में नित्य कवच पाठ करना चाहिए जो इस प्रकार है:-
हरिद्रा गणेश कवच : ईश्वर बोले हे प्रिये! समस्त सिद्धियों कोदेनेवाला कवच मैं तुम्हें बता रहा हूं तुम उसे सुनो। इसे पढ़कर और पढ़ा-कर मनुष्य सभी संकटों से मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य गणेश के कवच को बिना जाने उनके मन्त्र का जप करता है उसे करोड़ों कल्पों तक भी सिद्धि नहीं प्राप्त होती ।
हे महेश्वरि ! जो मनुष्य सब विध्नों के नाशक इस सर्वसिद्धि नामक, सर्वसिद्धियों को देनेवाले, साक्षात् पाप से छुड़ानेवाले, सर्वसम्पत्तियों को देनेवाले, समस्त शत्रुओं के साक्षात् विनाशक इस स्तोत्र को पढ़ता है उसकी ग्रहपीड़ायें, ज्वरादि रोग, या जो गुह्यकादि बाधक होते हैं वे सब तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं। हे देवि ! यह कवच धन-धान्य को देनेवाला और देवताओं द्वारा पूजित है। हे महेशानि ! इस कवच के समान तीनों लोकों में अन्य कोई नहीं है। हे महेशानि ! इस भूतल पर हरिद्रागणेश के अतिरिक्त अन्य अनेक असत्य कथनों से क्या लाभ ? क्योंकि उससे व्यर्थ आयु का क्षय होता है।
घाघ के जन्मकाल एवं जन्मस्थान के संबंध में बड़ा मतभेद है। इनकी जन्मभूमि कन्नौज के पास चौधरी सराय नामक ग्राम बताई जाती है। शिवसिंह सरोज का मत है कि इनका जन्म सं. 1753 में हुआ था, किंतु पं. रामनरेश त्रिपाठी ने बहुत खोजबीन करके इनके कार्यकाल को सम्राट् अकबर के राज्यकाल में माना है। कन्नौज के पास चौधरीसराय नामक ग्राम के रहने वाले घाघ के ज्ञान से प्रसन्न होकर सम्राट अकबर ने उन्हें सरायघाघ बसाने की आज्ञा दी थी। यह जगह कन्नौज से एक मील दक्षिण स्थित है। भड्डरी घाघ कवि की पत्नी थीं। घाघ-भड्डरी की वर्षा संबंधी लोकप्रिय कहावतें बहुत सहायक है। गावों में आज भी बहुत से व्यक्ति इन कहावतों को जानते हैं और बरसात का आकलन करते है। इस विषय पर हमारा एक विडिओ इस चैनल पर पहले से ही उपलब्ध है। आज के विडिओ की शृंखला राजस्थान के बारे में क्षेत्रीय भाषा में है। विडिओ कई भागों में है। आप सभी भाग देखकर लाभ उठा सकते हैं।
[1]
ईसानी।
बिसानी।।
–ईशान कोन में यदि बिजली चमके, तो पैदावार अच्छी होगी ।
[ 2 ]
अगस्त ऊगा।
मेह पूगा॥
–अगस्त तारा उदय होने पर बरसात का अंत समझना चाहिये ।
[ 3]
परभाते मेह डंवरा, साँजे सीला बाव।
डंक कहै हे भड्डुली, काला तणा सुभाव।।
–डंक भड्डुली से कहता है कि यदि प्रातःकाल मेघ भागे जा रहे हों और शाम को ठंडी हवा चले, तो समझना चाहिये कि अकाल पड़ेगा।
[4 ]
ऊगन्तेरो माछलो, अथन्व तेरी मोग।
डंक कहै हे भड्डुली, नहिंयाँ चढ़सी गोग।।
–यदि प्रातःकाल इन्द्रधनुष हो और संध्या को सूर्य की किरणें लाल दिखाई पड़ें, तो समझना चाहिये कि नदियों में बाढ़ आयेगी ।
[ 5 ]
आभा राता।
मेह माता।।
–आकाश लाल हो, तो वर्षा बहुत हो ।
[6 ]
आभा पीला।
मेह सीला।।
–आकाश पीला हो, तो वर्षा कम हो।
[7]
दुश्मन की किरपा बुरी, भली मित्र की त्रास।
आड़ंग कर गरमी करै, जद बरसन की आस।।
–शत्रु की कृपा की अपेक्षा मित्र की डान्ट-डपट अच्छी है। जब कड़ाके की गरमी पढ़ती है और पसीना नहीं सूखता, तब वर्षा की आशा होती है।
[8 ]
सवारो गाजियो, नै सापुरस रो बोलियो -एल्यो नही जाय।।
–सबेरे का गरजना और सत्पुरुष का वचन निष्फल नहीं जाता।
[ 9 ]
पानी पाला बादसा, उत्तर सूँ आवै।
–पानी, पाला और बादशाह उत्तर ही से आया करते हैं।
[10]
परभाते मेह डंबरा,
दोफाराँ तपन्त ।
रातू तारा निरमला,
चेला करो गछंत।।
–प्रातःकाल मेघ दौड़े, दोपहर को धूप कही हो और रात को निर्मल आकाश में तारे दिखाई पड़े, तो अकाल पड़ेगा, वहाँ से अपना रास्ता लेना चाहिये ।
[ 11]
बिंभलियाँ बोलै रात निमाई।
छाली बाडाँ बेस छिकाई।।
गोहाँ राग करै गरणाई।
जोराँ मेह मोराँ अजगाई।।
–यदि रात भर झींगुर बोले, बकरी बाड़ के पास बैठकर छींके, गाय ज़ोर से आवाज़ करे और मोर बोले, तो वर्षा होगी।
[ 12 ]
जिण दिन नीली बले जवासी।
माँडे राड साँपरी मासी।।
बादल रहे रातरा वासी।
तो जाणो चौकस मेह आसी।।
–यदि हरा जवासा जल जाय, बिल्लियाँ लड़े और रात के बादल सबेरे तक रहें, तो समझना चाहिये कि वर्षा अवश्य आयेगी ।
[ 13]
बिरछाँ चढ़े किरकाँट बिराजे।
स्याह हफेत लाल रंग साजे।।
बिजनस पवन सूरियो बाजे।
घड़ी पलक माँहे मेह गाजे।।
–यदि गिरगिट पेड़ पर बैठकर काला-सफेद या लाल रंग धारण करे और वायु उत्तर पश्चिम से चले, तो घड़ी दो घड़ी में वर्षा आयेगी ।
[ 14]
ऊँचो नाग चढ़े तर ओडे।
दिस पिछमाँण बादला दौड़े।।
सारस चढ़ असमान सजोडे।
तो नदियाँ ढाहा जल तोड़े।।
–यदि साँप पेड़ की चोटी पर चढ़े, मेघ पश्चिम दिशा को दौड़े और सारसों के जोड़े आकाश में उड़ें, तो नदी का जल किनारे को तोड़ कर बहेगा ।
[15]
ऊमस कर घृत माठ जमावै।
ईडा कीड़ी बाहर लावै॥
नीर बिना चिड़िया रज न्हावै।
मेह बरसे घर माँह न मावै।।
–यदि गर्मी से घी पिघल जाय, चींटियाँ अपना अंडा बाहर निकालें और चिड़ियाँ रेत में नहाये, तो इतना पानी बरसेगा कि घर में नहीं समायगा ।
[16]
जटा बधे बड़री जद जाँणा।
बादल तीतर पंख बखाणाँ।।
अवस नील रँग है असमाणाँ।
घण बरसे जल रो घमसाणाँ॥
–जब बरगद की जटा बढ़ने लगे, बादल का रंग तीतर के पंख की तरह हो जाय, और आकाश का रंग गहरा नीला हो जाय, तब घमासान वर्षा होगी।
[17]
गले अमल गुलरी हुवे गारी।
रबि सिसरे दोली कुंडारी॥
सुरपत धनख करै बिध सारी।
एरापत मघवा असवारी।।
–यदि अफ़ीम गलने लगे, गुड़ में पानी छूटने लगे, सूर्य और चन्द्रमा के चारों ओर कुण्डल हो, इन्द्रधनुष पूरा दिखाई दे, तो इन्द्र ऐरावत की सवारी पर आयेगा ।
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[18]
पवन गिरी छूटै परवाई।
ऊठे घटा छटा चढ़ आई।।
सारो नाज करै सरसाई।
धर गिर छोलाँ इन्द्र धपाई।।
–यदि पूर्व से हवा चले, बिजली की चमक के साथ बादल चढ़े तथा नाज हरा होने लगे, तो भूमि और पर्वत को इन्द्र पानी से अघा देंगे।
[19]
चैत चिड़पड़ा।
सावन निरमला।।
–यदि चैत्र में छोटी-छोटी बूंदें गिरें, तो सावन में वर्षा बिल्कुल न होगी ।
[ 20]
जेठ मूँगा।
सदा सूँगा।।
–यदि जेठ में अन्न महँगा हो, तो वर्ष भर सस्ता ही रहेगा ।
[ 21]
चैत मास नै पख अँधियारा।
आठम चौदस दो दिन सारा।।
जिण दिस बादल जिण दिस मेह।
जिण दिस निरमल जिण दिस खेह।।
–चैत्र के कृष्णपक्ष की अष्टमी और चतुर्दशी को जिस दिशा में बादल होंगे, उस दिशा में बरसात में वर्षा अच्छी होगी, और जिस दिशा में बादल न होंगे, उस दिशा में धूल उड़ेगी।
[22]
जेठा अंत विगाड़िया,
पूनम नै पड़वा।
–यदि जेठ की पूर्णिमा और आषाढ़ की प्रतिपदा को छींटें पड़े, तो लक्षण अच्छा नहीं।
[23]
जेठ बीती पहली पड़वा, जो अम्बर धरहड़े।
असाढ़ सावन जाय कोरो, भाद्रवे बिरखा करै॥
–आषाढ़ की प्रतिपदा को यदि बादल गरजे या वर्षा हो, तो आषाढ़ और सावन सूखे जायेंगे और भादों में वर्षा होगी ।
[ 24]
आसाढै सुद नौमी, घन बादल घन बीज।
कोठा खैर खखेर दो, राखौ बलद ने बीज।।
–आषाद सुदी नवमी को यदि बादल घना हो और खूब बिजली चम-कती हो, तो ज़माना अच्छा होगा। कोठिला खाली कर दो। सिर्फ बोने के जिये बीज और बैल रक्खेो ।
[ 25]
आसाढ़े सुद नवमी, नै बादल नै बीज।
हल फाड़ो ईंधन करो, बैठा चाबो बीज।।
–आषाढ़ सुदी नवमी को यदि बादल और बिजली न हो, तो हल को तोड़कर जला दो और बैठे-बैठे बीज को चबा जाओ। क्योंकि वर्षा नहीं होगी।
[ 26]
सावण पहली पंचमी, मेह न माँडे आल।
पीउ पधारो मालवे, मैं जासां मोसाल।।
–सावन बदी पंचमी तक यदि बादल बरसना प्रारम्भ न करे, तो हे पति ! तुम मालवे चले जाना, मैं अपने पीहर चली जाऊँगी। क्योंकि अकाल पड़ेगा ।
[ 27]
सावण बदी एकादसी, तीन नखत्तर जोय।
कृतिका होवे किरवरो, रोहन होय सुगाल॥
टुक यक आवै मिरगली, पडै अचिन्त्यौ काल।।
–सावन बदी एकादशी को तीन नक्षत्र देखो यदि कृत्तिका हो, तो वर्षा मामूली हो; रोहिणी हो, तो सुकाल हो; और यदि
मृगसिरा हो, तो ऐसा अकाल पड़ेगा, जैसा किसी ने सोचा भी नहीं होगा।
[ 28]
सावण पहले पाख में, जे तिथ ऊणी जाय।
कैयक कैयक देस में, टावर बेचै माय।।
–सावन के पहले पक्ष में यदि कोई तिथि टूट जाय, तो किसी-किसी देश में ऐसा अकाल पड़ेगा कि माताएँ अपने बच्चे बेंचेंगी ।
[ 29]
सावण पहली पंचमी, झीनो छाँट पड़े।
डंक कहै हे भडुली, सफलाँ रून्ख फलै।।
–यदि सावन बदी पंचमी को छींटें पड़े, तो डंक भडली से कहते हैं कि दृष्टि अच्छी होगी और वृक्षों में फल आयेंगे ।
[ 30]
सावण पहिली पंचमी, जो बाजे बहु बाय।
काल पड़े सहु देस में, मिनख मिनख नै खाय।।
–सावन बदी पंचमी को यदि गहरी हवा चले, तो देश भर में ऐसा अकाल पड़ेगा कि आदमी को आदमी खा जायगा ।
[ 31]
आसोजां रा मेहड़ा, दोय बात विनास।
बोरड़ियाँ बोर नहिँ, बिणयाँ नहीं कपास।।
–आश्विन में यदि वर्षा हो, तो दो प्रकार की हानि होगी बेर की झाड़ियों में बेर नहीं लगेंगे और कपास में रुई न लगेगी ।
[ 32]
आसवाणी।
भागवाणी।।
–आश्विन में वर्षा भाग्यवानों के यहाँ होती है।
[ 33]
सासू जितरै सासरो।
आसू जितरै मेह।।
–जब तक सास जीती रहती है, तब तक ससुराल का सुख है। इसी प्रकार आश्विन तक वर्षा की आशा रहती है।
[ 34]
काती सब साथी।।
–कार्तिक में सब फसलें साथ पकती हैं।
[ 35]
दीवाली रा दीया दीठा।
काचर बोर मतीरा मीठा॥
–दिवाली का दिया दिखाई देने तक कचरी, बेर और तरबूज़ मीठे हो जाते हैं।
[ 36]
काती रो मेह,
कटक बराबर।
–कार्तिक की वर्षा खेती के लिये वैसी ही हानिकारक है, जैसी सेना दुश्मन के लिए।
[ 37]
मिंगसर बद वा सुद मँहीं, आधे पोह उरे।
भँवरा धुंध मचाय दे, तो समियो होय सिरे॥
–यदि अगहन के कृष्ण या शुक्लपक्ष में या पौष के पहले पक्ष में यदि प्रातःकाल धुन्धला हो, तो ज़माना अच्छा होगा।
=============================================
[ 38]
मिंगसर बद वा सुद महीं, आधे पोह उरे।
धुंवर न भीजे धूल तो, करसण काहे करे।।
–अगहन बदी या सुदी में या पौष बदी में मिट्टी ओस से गीली न हो, तो भूमि क्यों बोई जाय? अर्थात् उपज अच्छी न होगी ।
[ 39]
पोह सबिंभल पेखजे, चैत निरमलो चंद।
डंक कहै हे भडुली, मण हूत्ता अन मंद॥
–पौष में यदि गहरे बादल दिखाई पड़े और चैत्र में चन्द्रमा स्वच्छ दिखाई पड़े, तो डंक भङ्डली से कहता है कि अन्न रुपये के एक मन से भी सस्ता हो जायगा ।
[ 40]
बरसे भरणी।
छोड़े परणी।।
–यदि भरणी नक्षत्र में बरसात हो, तो परिणीता (विवाहिता स्री) को छोड़ना पड़ेगा। अर्थात् विदेश जाना पड़ेगा ।
[ 41]
किरती एक जबूकड़ो,
ओगन सह गलिया।
–कृतिका नक्षत्र (9 से 22 मई तक) की बिजली की एक चमक भी पहले के सब अपशकुनों का नाश कर देती है।
[42]
रोहन रेली। रुपया री अधेली।।
–रोहिणी में वर्षा हो, तो फ़सल रुपये की अठन्नी भर रह जायगी ।
[ 43 ]
पहली रोहन जल हरै, बीजी बहोतर खाय।
तीजी रोहन तिण हरै, चौथी समन्दर जाय।।
–यदि पहली रोहिणी में वर्षा हो, तो अकाल पड़े; दूसरी में बहत्तर दिन तक सूखा पड़े; तीसरी में घास न उगे और चौथी में मूसलधार वर्षा हो ।
[ 44 ]
रोहन तपै नै मिरगला बाजै।
अदरा मैं अनचीतियो गाजै।।
–रोहिणी में कड़ाके की गरमी पड़े, मृगशिरा में आँधी चले, तो आर्दा में मेघ खूब गरजेगा ।
[ 45 ]
रोहन बाजै मृगला तपै।
राजा जूझे परजा खपै।।
–यदि रोहिणी नक्षत्र में आँधी चले और मृगशिरा में खूब धूप हो, तो राजा लोग लड़ेंगे और प्रजा का नाश होगा।
[ 46 ]
मिरगा बाव न बाजियो,
रोहन तपी न जेठ।
केनै बाँधो झुँपड़ो,
बैठो बड़लै हेठ।।
–यदि मृगशिरा में हवा न चले, और जेठ में रोहिणी नक्षत्र में कड़ाके की धूप न हुई, तो झोपड़ा क्यों बनाते हो? बरगद के नीचे बैठ जाओ। अर्थात् अकाल पड़ने से दूसरे स्थान को जाना होगा ।
[ 47 ]
द्वै मूसा है द्वै कातरा, द्वै टीडी द्वै ताव।
दोयाँ री बादी जल हरै, द्वै बीसर द्वै बाव॥
–यदि मृगशिर के प्रथम दो दिनों में हवा न चले, तो चूहे पैदा हों। तीसरे चौथे दिन हवा न चले, तो गुबरीले पैदा हों। पाँचवें छठे दिन हवा न चले, तो टीड़ी पैदा हों। सातवें आठवें दिन हवा न चले, तो ज्वर फैले। नवें दसवें हवा न चले, तो वर्षा कम हो। ग्यारहवें बारहवें हवा न चले, तो ज़हरीले कीड़े पैदा हों और तेरहवें चौदहवें हवा न चले, तो खूब आँधी चले ।
[ 48 ]
पहली आद टपूकड़े,
मासाँ पाखाँ मेह।
–यदि आर्द्रा के प्रारम्भ में बूँदें पड़ जायें, तो महीने पखवाड़े में वर्षा हो।
[ 49 ]
आदरा बाजे बाय।
झून्पड़ी जोला खाय॥
–आर्द्रा में हवा चले, तो झोपड़ी डाँवाडोल हो जाय। अर्थात् अकाल पड़े और घर छोड़ना पड़े।
[ 50]
एक आदरयो हाथ लग जाय,
पछै तो जाट राजी।
–आर्द्रा में एक बार भी वर्षा हो जाय, तो जाट (किसान) प्रसन्न हो जाय ।
[ 51 ]
आदरा भरै खाबड़ा, पुनरबसु भरै तलाव।
नै बरस्यो पुखै, तो बरसही घणा दुखै।।
–आर्द्रा में वर्षा हो, तो गड्डे पानी से भर जायेंगे। पुनर्वसु में बरसे, तो तालाब भर जाय और यदि पुष्य में न बरसे, तो फिर कठिनता से बरसेगा ।
[ 52 ]
असलेखा बूँठा,
बैदा घरे बधावना।
–अश्लेषा में वर्षा हो, तो वैद्यों के घर बधाई बजे अर्थात् रोग खूब फैलेगा ।
[ 53 ]
मघा माचन्त मेहा ।
नही तो उड़ंत, खेहा॥
–मघा में यदि बरसे, तो ठीक, नहीं तो धूल उड़ेगी ।
[ 54 ]
मघा मेह माचन्त।
नहीं तो गच्छन्त।।
–मघा में या तो वर्षा होगी, या मेघ चले जायेंगे ।
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[ 55 ]
भाद्रवे जग रेलसी, जे छट अनुराधा होय।
डंक कहै हे भड्डली, चिन्ता करौ न कोय।।
–यदि भादों बदी छठ को अनुराधा हो, तो वर्षा खूब होगी। डंक कहता है- हे भड्डरी ! चिन्ता न करो।
[ 56 ]
आखा रोहन बायरी, राखी स्रवन न होय।।
पोही मूल न होय तौ, महि डोलन्ती जोय।।
–अक्षय तृतीया को रोहिणी न हो, रक्षाबन्धन पर श्रवण न हो और पौष की पूर्णिमा को मूल न हो, तो पृथ्वी काँप उठेगी ।
[ 57 ]
चित्रा दीपक चेतवे, स्वाते गोबरधन्न।
डंक कहै हे भइली, अथग नीपजे अन्न।।
–यदि चित्रा में दीवाली हो, और गोवर्धन पूजा के समय स्वाती हो, त्तो डंक भडुली से कहता है कि अन्न की उपज बहुत होगी।
[ 58 ]
स्वाते दीपक प्रजले, बिसाखा पूजे गाय।
लाख गयन्दा धड़ पड़े, या साख निस्फल जाय।।
–यदि दीवाली स्वाती नक्षत्र में हो, और दूसरे दिन गोपूजन के समय बिशाखा हो, तो लड़ाई होगी; जिसमें लाखों हाथी मारे जायेंगे, या फ़सल निष्फल होगी ।
[ 59 ]
दीवा बीती पंचमी, सोम सुकर गुरु मूल।
डंक कहै हे भडुली, निपजे सातो तूल।।
–कार्तिक सुदी पंचमी को यदि मूल नक्षत्र में सोमवार, शुक्रवार या बृहस्पतिवार पड़े, तो डंक भडुली से कहता है कि सातो प्रकार के अन्न उत्पन्न होंगे ।
[ 60-61 ]
काती पूनम दिन कृति, चंद मधाने जोय।
आगे पीछे दाहिने, जिणसूं निश्चय होय।।
आगे हूवै तो अन्न नहीं, पासे हूवै तो ईत।
पीठ हुयाँ परजा सुखी, निस दिन रह्यो नचीत।।
–कार्तिक की पूर्णमासी को देखो कि चन्द्रमा का मध्य किस तरफ है, आगे है या पीछे या दाहिने ? उनसे निश्चय होगा कि यदि आगे होगा, तो अन्न नहीं उपजेगा; दाहिने होगा तो ईतिभीति होगी और यदि पीछे होगा तो प्रजा सुखी रहेगी और रात-दिन निश्चिन्त रहना ।
* अतिवृष्टि, अनावृष्टि, चूहे, टिड्डी, पक्षी और राज-विद्रोह, ये छः ईति कहते हैं।
[ 62 ]
माहे मंगल जेठ रवि, भादरवै सनि होय।
डंक कहै है भड्डली, बिरला जीवै कोय।।
–यदि माघ में पाँच मंगल, जेठ में पाँच रविवार और भादों में पाँच शनिवार पड़े, तो डंक भड्डली से कहता है कि ऐसा अकाल पड़ेगा कि शायद ही कोई जीवित बचे ।
[ 63 ]
सावण मास सूरियो बाजै, भादरवे परवाई।
आसोजाँ में समदरी बाजै, काती साख सवाई।।
–यदि श्रावण में उत्तर पश्चिम की हवा चले, भादों में पूर्वा, और कुवार में पश्चिम की हवा चले, तो कार्तिक में फसल अच्छी हो ।
[ 64 ]
पवन बाजै पूरियो।
हाली हलावकीम पूरियो।।
–यदि उत्तर पश्चिम की हवा चले, तो किसान को नई ज़मीन में हल नहीं चलाना चाहिये। क्योंकि वर्षा जल्दी ही आनेवाली है।
[ 65 ]
आधे जेठ अमावस्या, रिव आथिम तो जोय।
बीज जो चंदो ऊगसी, तो साख भरेला सोय।।
उत्तर होय तो अति भलो, दक्खन होय दुकाल।
रवि माथे ससि आथये, तो आधो एक सुगाल।।
–जेठ की अमावस्या को जहाँ सूर्योदय होता है, उस स्थान को याद रक्खो । यदि जेठ सुदी द्वितीया का चन्द्रमा उस स्थान से उत्तर में हो, तो ज़माना अच्छा होगा; दक्षिण में होगा, तो अकाल पड़ेगा; और यदि उसी स्थान पर होगा, तो समय साधारण होगा ।
[ 66 ]
आसाड़े धुर अष्टमी, चन्द उगन्तो जोय।
कालो वै तो करवरो, धोलो वै तो सुगाल।।
जे चंदो निर्मल हवै, तो पड़ै अचिन्त्यो काल।।
–आषाढ़ बदी अष्टमो को उदय होते हुए चन्द्रमा की ओर देखो, यदि वह काले बादलों में हो, तेा समय साधारण होगा; यदि सफेद बादलों में होगा, तो समय अच्छा होगा; और यदि बादल नहीं होगा, तो निश्चय अकाल पड़ेगा।
[ 67 ]
सोमाँ सुकरौँ सुरगुराँ, जे चन्दो ऊगन्त।
डंक कहै हे भड्डली, जल थल एक करन्त।।
–यदि आषाढ़ में चन्द्रमा सोमवार, शुक्रवार या गुरुवार को उदय हो, सो डंक भड्डली से कहता है कि ऐसी वृष्टि होगी कि जल और थल एक हो जायेंगे ।
[ 68 ]
सावन तो सूतो भलो,
ऊभो भलो असाढ़।।
–द्वितीया का चन्द्रमा सावन में सोता हुआ अच्छा है और आषाढ़ में खड़ा हुआ ।
[ 69 ]
मंगल रथ आगे हुवै, लारे हुवै जो भान।
आरँभिया यूँ ही रहै, ठाली रवै निवाण।।
–यदि सूर्य के आगे मंगल हो, तो सारी आशाओं पर पानी फिर जायगा और तालाब सूखे पड़े रहेंगे।
[ 70 ]
सोमाँ सुकरौं बुध गुराँ, पुरबाँ धनुस तणै।
तीजै चौथै देहरै, समदर ठेल भरै।।
–यदि सोम, शुक्र, बुध और गुरुवार को पूर्व दिशा में इन्द्रधनुष तने, तो उसके तीसरे-चौथे दिन इतनी वृष्टि होगी कि समुद्र भर जायगा ।
[ 71 ]
रार करो तो बोलो आड़ा।
कृषी करो तो रक्खो गाड़ा।।
–यदि झगड़ा करना हो, तो एड़ी-बैंड़ी बात बोलो। और यदि खेती करना हो, तो गाड़ी रक्खो ।
[ 72 ]
जो तेरे कंता धन घना, गाड़ी कर ले दो।
जो तेरे कंता धन नहीं, कालर बाड़ी बो॥
–हे स्वामी ! यदि तुम्हारे पास अधिक धन हो, तो दो गाड़ियाँ बनवा लो; और यदि धन न हो, तो बाड़ी में कपास बो दो ।
[73 ]
चैत मास उजियाले पाख।
नव दिन वीज लुकोई राख।।
आठम नम नीरत कर जोय।
जाँ बरसे जाँ दुरभख होय।।
–चैत्र शुक्ल में प्रतिपदा से नवमी तक यदि बिजली न चमके, अष्टमी और नवमी को ख़ास तौर पर देखना चाहिये तो जहाँ वर्षा हो, वहाँ अकाल पड़ेगा ।
आज हम बात करेंगे मंगल शुक्र युति के बारे में और विशेष तौर पर मंगल शुक्र की युति से होने वाले व्यवसाय के बारे में। सबसे पहले हम मंगल पर विचार करते हैं मंगल यदि रोजगार कारक होता है तो मंगल से संबंधित कौन-कौन से व्यवसाय में करियर बनता है? व्यक्ति को क्या करियर मिलता है?
मंगल बिजली और ऊर्जा से संबंधित विभाग में जोब देता है, अग्नि से संबंधित कार्य देता है, मंगल स्थाई संपत्ति का कार्य देता है, हथियारों से संबंधित कार्य देता है, मशीन, धातु कल- कारखाने देता है। वृश्चिक लग्न में मंगल लग्नेश होता है तो वह व्यक्ति को चिकित्सक या मनोवैज्ञानिक बनाता है। मंगल पुलिस विभाग में या सेना में कोई जॉब देता है, बिल्डर बनाता है अर्थात कंस्ट्रक्शन से जोड़ता है, मैकेनिक बनाता है, इंजीनियर बनाता है, डिजाइनर बनाता है, मंगल सेफ बनाता है, अर्थात पाक कला से संबंधित जॉब देता है। मंगल व्यक्ति को तर्कशक्ति देता है। इस प्रकार से ये मंगल के व्यवसाय होते हैं।
इसके अलावा मंगल यदि बहुत अच्छी स्थिति में नहीं होता है तो थोड़े कम दर्जे के व्यवसाय देता है या जॉब देता है; जैसे कोई साधारण स्तर का कर्मचारी हो, साधारण स्तर का सर्जन हो, रसोईया हो, जेल में काम करने वाले व्यक्ति हो, लोडर चलाने वाला हो, पुलिसकर्मी हो, मछुआरा हो, मुक्केबाज, पहलवान व एथलीट हो। सामान्य किसान हो, इस तरह से यह मंगल कार्य देता है।
इसके अलावा यदि मंगल कुंडली में और भी खराब स्थिति में हो तो व्यक्ति अंतिम संस्कार करने वाला, अंत्येष्टि कर्ता, खदान में काम करने वाला, श्रमिक, जासूसी करने वाला, सुरक्षा गार्ड, अंगरक्षक, गुप्त एजेंट, अपराधी, धोखेबाज, ठग, फोरेंसिक विशेषज्ञ, शराब, तंबाकू, दवाइयों का काम करने वाला, ड्रग्स का काम करने वाला, चोरी का सामान खरीदने वाला, जहर, रसायन आदि कार्य करने वाला, गोताखोर, शिकारी, रहस्यवादी, टेलीपैथी से जुड़ा हुआ, मालिश करने वाला आदि इस प्रकार से मंगल के व्यवसाय होते हैं।
क्योंकि हम बात कर रहे थे मंगल शुक्र की युति के बारे में, तो उससे पहले हम यह देख लेते हैं की मंगल के जो नक्षत्र होते हैं उसके आधार पर मंगल क्या फल देता है तो –
मंगल का नक्षत्र मृगशिरा होता है। यदि मृगशिरा में मंगल रोजगार कारक हो तो व्यक्ति चित्रकार, भाषा विचारक, खेती का व्यापार करने वाला, डिजाइनर, पशु चिकित्सा, रियल एस्टेट का कर्मचारी होता है।
हम चित्रा नक्षत्र की बात करते हैं की मंगल जब चित्रा नक्षत्र में होता है तो क्योंकि यह मंगल का नक्षत्र है तो व्यक्ति मूर्तिकार, चित्रकार, वास्तु का कार्य करने वाला, फैशन डिजाइनर, फोटोग्राफर, आलोचक, आदि होता है।
अब मंगल के एक और नक्षत्र के बारे में बात करते हैं जो है धनिष्ठा। धनिष्ठा में मंगल हो तो व्यक्ति एथलीट होता है, खेलों से जुड़ा हुआ होता है, संगीतकार आदि भी हो सकता है, रियल एस्टेट का कर्मचारी होता है, सर्जन होता है। इस प्रकार से हमने मंगल की बातें की तो मंगल शुक्र के योग के बारे में बात करें तो हमें देखना होगा कि शुक्र क्या व्यवसाय देता है?
शुक्र व्यक्ति को कला से संबंधित व्यवसाय देता है। नाट्य कला, संगीत, गायन, चित्रकला, ललित कला, डेयरी व्यवसाय, फैशन का कार्य, फैंसी आइटम का कार्य आदि।
कुंडली का दशम भाव कर्म के रूप में जाना जाता है। मंगल और शुक्र यदि दशम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति सौंदर्य शास्त्र और भौतिकता से संबंधित कोई कार्य करेगा। मंगल क्रिया और ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है जबकि शुक्र प्रेम और सुंदरता का प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रकार से यह व्यक्ति ऐसे कार्यक्षेत्र की ओर आकर्षित होता है जहां कलात्मक गतिविधियों के माध्यम से स्वयं को अभिव्यक्त करता है। व्यक्ति में नेतृत्व क्षमता भी आती है और जिस क्षेत्र को वह चुनता है उसमें उत्कृष्ट प्राप्त करने की इच्छा भी व्यक्ति में होती है और कैरियर सफल बनता है। व्यक्ति की सकारात्मक सार्वजनिक छवि बनती है। उसे भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है, परंतु शुक्र मंगल का योग वैवाहिक जीवन के लिए अच्छा नहीं होता है। मंगल व शुक्र के योग के कारण से रिश्तों के मामले में संतुलन की आवश्यकता होती है।
मंगल शुक्र के योग से व्यक्ति कीमती रत्नों का, धातुओं का काम, फैशन डिजाइनिंग का कार्य आदि करता है। ऐसा व्यक्ति जनसंपर्क का कार्य, मीडिया आदि का कार्य करता है। व्यक्ति नेटवर्किंग और इवेंट के कार्य में भी अपना करियर बनाता है। शुक्र भौतिक सफलता प्राप्त करवाता है, समृद्धि प्रदान करता है। व्यक्ति प्रसिद्ध होता है तथा उसे विभिन्न पुरस्कार प्राप्त होते हैं। व्यक्ति महत्वाकांक्षी होता है। अतः हम कह सकते हैं की दशम भाव में मंगल शुक्र की युति व्यक्ति को इस प्रकार का व्यवसाय देती है।
प्रकाश हर आंतरिक योजना का एक अनिवार्य तत्व है और प्रत्येक कमरे की प्रारंभिक योजना में इस पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। पर्याप्त और सुविधाजनक रूप से नियोजित आउटलेट वास्तुशिल्प योजना का एक अभिन्न अंग होना चाहिए। कृत्रिम प्रकाश की योजना एक बड़ी समस्या प्रस्तुत करती है, क्योंकि इसके लिए सौंदर्य और व्यावहारिक दोनों तरह के विचारों की आवश्यकता होती है।
औसत कमरे के प्रकाश उपकरणों और फिक्सर सजावट की शैली के अनुरूप होने चाहिए और कमरे के चरित्र और वातावरण में लगातार योगदान करना चाहिए।
प्रकाश व्यवस्था के प्रकार
प्रकाश व्यवस्था के दो प्रकार हैं:
1 प्राकृतिक
2 कृत्रिम
1 प्राकृतिक
दिन का प्रकाश प्राकृतिक प्रकाश प्रदान करता है और सूर्य की स्थिति और दिन के समय के अनुसार बदलता रहता है। रंग दृश्यता के लिए प्रकाश आवश्यक है। बनावट भी उनके द्वारा अवशोषित या परावर्तित प्रकाश से प्रभावित होती है।
2 कृत्रिम
ये दो प्रकार के होते हैं:
तापदीप्त प्रकाश
प्रतिदीप्त प्रकाश
(क) तापदीप्त प्रकाश:
फ्लोरोसेंट लैंप तथा एल ई डी लाइटिंग निचली छत के अनुप्रयोग और सामान्य प्रकाश व्यवस्था के लिए उपयुक्त हैं। वे विसरित प्रकाश प्रदान करते हैं।
प्रकाश व्यवस्था के चयन में विचार प्रकाश व्यवस्था के चयन में विचार निम्नानुसार हैं:
कार्य सुरक्षा
सौंदर्य कार्य:
1 सुरक्षा
प्रकाश व्यवस्था के कार्य का मूल्यांकन दृष्टि की मात्रा और गुणवत्ता के संदर्भ में किया जाना चाहिए। प्राथमिक लक्ष्य दृश्य स्पष्टता और अतिथि की सुरक्षा है। सुरक्षा: प्रकाश व्यवस्था के विचार में सुरक्षा महत्वपूर्ण है क्योंकि अनुचित प्रकाश व्यवस्था किसी विशेष क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्तियों के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। सीढ़ियों पर दुर्घटनाओं को रोकने के लिए पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था की आवश्यकता होती है। सुरक्षा के लिए उचित वायरिंग इन्सुलेशन और अर्थिंग पर भी विचार किया जाना चाहिए।
2 सुंदरता:
प्रकाश व्यवस्था के प्रकार और रंग की उपस्थिति के बीच एक घनिष्ठ संबंध है। गलत रंग विकल्प अच्छी तरह से योजनाबद्ध योजनाओं की प्रभावशीलता को कम करते हैं। डिजाइनर को दृश्य रुचि बनाने के लिए चमक / कंट्रास्ट का उपयोग करना चाहिए। आंतरिक प्रकाश व्यवस्था क्षेत्र के कुल डिजाइनिंग का एक अभिन्न अंग होना चाहिए।
प्रकाश व्यवस्था के तरीके
प्रकाश व्यवस्था के दो तरीके हैं:
1 वास्तुकला प्रकाश व्यवस्था
2 गैर वास्तुकला प्रकाश व्यवस्था
वास्तुकला प्रकाश व्यवस्था
यह कार्यात्मक प्रकाश व्यवस्था प्रदान करता है और समकालीन कमरों के लिए अच्छा है।
वैलेंस लाइटिंग:
एक ऐतिहासिक फ्लोरोसेंट ट्यूब को वैलेंस बोर्ड के पीछे रखा जाता है, जो प्रकाश को ऊपर की ओर ले जाता है जो परावर्तित होता है और फिर नीचे की ओर, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह की रोशनी प्रदान करके पर्दे पर चमकता है।
(ख) कॉर्निस लाइटिंग:
एक कॉर्निस छत में इंसुलेट किया जाता है और प्रकाश को नीचे की ओर निर्देशित करता है। यह पर्दे, दीवार कवरिंग और चित्रों पर नाटकीय प्रभाव प्रदान कर सकता है।
(ग)कवर्ड लाइटिंग:
कवर्ड लाइटिंग में एक समूह में या एक कमरे की एक या अधिक दीवारों पर लगातार फ्लोरोसेंट ट्यूबों की एक श्रृंखला रखना शामिल है।
(घ)सॉफिट लाइटिंग:
यह प्रत्यक्ष प्रकाश व्यवस्था की एक विधि है जिसमें प्रकाश स्रोत से रोशनी सीढ़ियों, रिसेप्शन, लाउंज आदि में उपयोग किए जाने वाले सॉफिट या बीम के नीचे बनाई जाती है।
(ड़)चमकदार प्रकाश व्यवस्था:
यह किसी विशेष क्षेत्र को रोशन करने के लिए छिपी हुई रोशनी है जैसे कि रसोई, उपयोगिता क्षेत्र, बाथरूम आदि।
गैर-वास्तुशिल्प प्रकाश
व्यवस्था इसमें दीवारों और छत से परावर्तित प्रकाश शामिल है। पोर्टेबल लैंप का उपयोग सामान्य समग्र प्रकाश या स्थानीयकृत प्रकाश के लिए भी किया जा सकता है।
अन्य प्रकाश व्यवस्था
अन्य प्रकाश व्यवस्था: टेबल लाइटिंग, पॉइंट सोर्स, एक्सेंट डिफ्यूज्ड और एम्बिएंट लाइटिंग। प्रकाश व्यवस्था: प्रकाश व्यवस्था के प्रकारों को इस आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है कि प्रकाश की किरणें प्रकाशित होने वाली वस्तु पर किस तरह से निर्देशित होती हैं। प्रत्यक्ष प्रकाश: यह एक प्रकार का प्रकाश है जो अधिकांश टेबल और फ़्लोर लैंप द्वारा उत्पादित होता है। प्रकाश नीचे की ओर निर्देशित होता है और छत पर परावर्तित प्रकाश पड़ता है। यह प्रकाश तेज छाया और कुछ प्रकाश उत्पन्न करता है।प्रत्यक्ष प्रकाश व्यवस्था को आमतौर पर आवश्यकताओं के अनुसार अन्य प्रकार की प्रकाश व्यवस्था के साथ जोड़ा जाता है, जैसे स्पॉट लाइटिंग।
अप्रत्यक्ष प्रकाश व्यवस्था:
इस प्रकार की प्रकाश व्यवस्था में, प्रकाश को छत या दीवारों की ओर निर्देशित किया जाता है, जहाँ से यह कमरों में परावर्तित होता है। तत्काल प्रकाश स्रोत दृश्य से अलग होता है। कुल मिलाकर, अप्रत्यक्ष प्रकाश व्यवस्था के साथ कमरे की रोशनी कम, कम, प्रकाश स्रोत चमक के साथ फैल जाएगी या कम छाया होगी। जब ऊपर इस्तेमाल किया जाता है, तो अप्रत्यक्ष प्रकाश व्यवस्था सपाट और छाया के बिना नीरस होती है। यह कवर किए गए वैलेंस और कॉर्निस फिटिंग की सामान्य प्रकाश व्यवस्था के लिए उपयुक्त है। अन्य प्रकाश व्यवस्थाएँ अर्ध प्रत्यक्ष और अर्ध अप्रत्यक्ष प्रकाश व्यवस्था हैं।
लाइट फिटिंग
डिमर्स:
इन्हें ऑन और ऑफ स्विच के साथ जोड़ा जाता है और एक निश्चित समय पर या अलग-अलग कमरों में अलग-अलग समय पर लाइट के चालू और बंद होने के स्तर को नियंत्रित करते हैं। कई डिमर्स को एक ही नियंत्रण से जोड़ा जा सकता है।
2. एंटी बर्गलर:
ये लाइट एक टाइम स्विच पर काम करती हैं जो अलग-अलग कमरों में एक निश्चित समय पर या अलग-अलग समय पर लाइट को चालू और बंद करती हैं।
3. डोर स्विच:
यह लाइट डोरफ्रेम में सेट की जाती है और दरवाजा खुलने पर चालू हो जाती है।
4. फोटो सेल कंट्रोल:
लाइट सेंसिटिव यूनिट प्रवेश द्वार पर स्विच की जगह ले सकती हैं, जहाँ लाइट को सक्रिय करने के लिए फोटोसेल कार्ड लगाने की ज़रूरत होती है।
5. फुल फिटिंग या पेंडेंट लाइट:
इन्हें डाइनिंग टेबल, बिलियर्ड्स टेबल और स्पॉट लाइटिंग के लिए लगाया जाता है। कंट्रोल स्विच टेबल पर दिया गया फिंगर टैप स्विच हो सकता है।
होटलों में अलग-अलग क्षेत्रों के लिए लाइटिंग प्रवेश हॉल:
प्रवेश हॉल दिलचस्प दिखना चाहिए और लाइटिंग जगह के माहौल के हिसाब से होनी चाहिए। दिन के समय, अगर कोई बाहर से आता है तो प्रवेश द्वार फीका और धुंधला दिखाई दे सकता है। हॉल में रिसेप्शन डेस्क, डिस्प्ले बोर्ड आदि पर रोशनी पर्याप्त उज्ज्वल होनी चाहिए। चकाचौंध से बचने के लिए सावधानी बरतनी चाहिए लेकिन रोशनी इतनी होनी चाहिए कि मेहमान स्पष्ट रूप से पढ़ सकें।
लाउंज क्षेत्र: लाउंज क्षेत्र में, समग्र प्रकाश प्रदान करने के लिए एक झूमर या सामान्य प्रकाश फिटिंग लगाई जा सकती है। छत पर प्रतिबिंबित करने के लिए कॉर्निस लाइटिंग लगाई जा सकती है, दीवार ब्रैकेट और अन्य फिटिंग का उपयोग करके कोव्ड लाइटिंग प्रदान की जा सकती है। जब कोई फाल्स सीलिंग होती है, तो प्रकाश छत में अंतराल के माध्यम से या छत में लगे ग्लास पैनलों के माध्यम से आ सकता है। यहाँ लैंप फिटिंग छिपी हुई होती है और केवल प्रकाश ही परावर्तित होता है। लाउंज का वातावरण आरामदायक और सुकून देने वाला होना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो स्थानीयकृत रोशनी का उपयोग किया जा सकता है और पोर्टेबल फिटिंग प्रदान की जा सकती है। कैफेटेरिया से जुड़े क्षेत्र के मामले में, त्वरित सेवा के लिए उच्च स्तर की रोशनी आवश्यक हो सकती है।
रेस्तरां: रेस्तराँ में, मंद रोशनी आमतौर पर विशेष रूप से ऊँचाई पर परिपूर्ण होती है। सामान्य प्रकाश व्यवस्था आमतौर पर भोजन के लिए उपयोग की जाती है। फ्लोरोसेंट व एल ई डी लाइटिंग का भी उपयोग किया जा सकता है। भोजन के रंग पर प्रकाश के प्रभाव पर विचार किया जाना चाहिए।
गलियारे: गलियारों में मंद रोशनी की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन धुँधलापन नहीं होना चाहिए और अतिथि को कमरे का नंबर स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम होना चाहिए। प्रकाश की व्यवस्था एक दूसरे से बहुत दूर नहीं होनी चाहिए। कॉर्निस या छत की रोशनी काफी उपयुक्त है।
सीढ़ियाँ: दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सीढ़ियों पर अच्छी रोशनी होनी चाहिए। रोशनी दीवार के साथ या रेलिंग के ठीक नीचे लगाई जा सकती है। ओवरहेड लाइट के मामले में, फिटिंग को सीढ़ियों की प्रत्येक उड़ान के अंत में रखा जाना चाहिए।
शयनकक्ष: शयनकक्षों में आम तौर पर सामान्य प्रकाश व्यवस्था की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन कमरे के विभिन्न हिस्सों में पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था प्रदान की जानी चाहिए। प्रकाश बहुत उज्ज्वल नहीं होना चाहिए। एक सामान्य दीवार लाइट, एक टेबल लैंप, बेडसाइड लाइट मानक लाइट हैं। दुर्घटनाओं को रोकने या अतिथि को अंधेरे कमरे में प्रवेश करने से रोकने के लिए लाइट को दरवाजे के साथ-साथ बिस्तर के हेडबोर्ड पर भी नियंत्रित किया जाना चाहिए। बेडसाइड लाइट को दीवार पर लगाया जा सकता है या टेबल लैंप के रूप में तय किया जा सकता है। उन्हें अतिथि को किताब पढ़ने में सक्षम बनाने के लिए पर्याप्त रूप से ऊंचा रखा जाना चाहिए। ड्रेसिंग टेबल लाइट को चेहरे को रोशन करने के लिए पर्याप्त रोशनी प्रदान करनी चाहिए, न कि दर्पण को। पेल्मेट लाइट लगाई जा सकती है जो पर्दे को रोशन करती है और खिड़की के आसपास एक हल्की चमक देती है। अलमारी में बनी अलमारी में एक लाइट अंदर होनी चाहिए ताकि मेहमान सामान को स्पष्ट रूप से देख सकें। इस लाइट को अलमारी की छत पर लगाया जा सकता है।
बाथरूम: बाथरूम में सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। फिटिंग वाष्प और जलरोधी फिटिंग के साथ सुरक्षित होनी चाहिए। सभी विद्युत फिटिंग और उपकरणों में दोहरे स्विच होने चाहिए जिन्हें बाहर से नियंत्रित किया जा सकता है। धातु की तुलना में प्लास्टिक या कांच को प्राथमिकता दी जाती है। मुख्य आपूर्ति से स्वतंत्र रूप से संचालित होने वाली एक आपातकालीन लाइट प्रदान की जानी चाहिए जो बिजली की विफलता के दौरान जलती है। इस लाइट को सीढ़ियों, गलियारों और निकास द्वारों में रखा जाना चाहिए।
मूड और वातावरण पर प्रकाश का प्रभाव
प्रकाश व्यवस्था का चयन, प्रकाश की तीव्रता, उसका रंग और उपयोग किए जाने वाले सामान कमरे के मूड और वातावरण को प्रभावित करते हैं। बेडरूम में प्रकाश व्यवस्था गर्म और आरामदायक होनी चाहिए। फिर भी, यह कमरे में रखी वस्तुओं को देखने के लिए पर्याप्त उज्ज्वल होनी चाहिए। कम वाट क्षमता और मध्यम वाट क्षमता की रोशनी उपयुक्त है। डिमर स्विच का उपयोग करके वातावरण और मूड को बदला जा सकता है। डाउन लाइटर और वॉल वॉशर की एक श्रृंखला कमरे को रोशन करने और रहने वालों को चकाचौंध से बचाने के लिए उपयुक्त होगी। टेलीफोन, दर्पण, कोट रैक द्वारा सहायक प्रकाश व्यवस्था आवश्यक हो सकती है। एक रेस्तरां में, टेबल के ऊपर पेल्मेट लाइट और पेंडेंट लैंप का उपयोग करके एक आरामदायक मूड बनाया जा सकता है। लोगों के आस-पास रोशनी कम होनी चाहिए, लेकिन भोजन के ऊपर मध्यम वाट क्षमता होनी चाहिए। मार्ग दिखाई देने चाहिए।रोमांटिक माहौल बनाने के लिए मोमबत्ती की रोशनी का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। छाया के साथ बारी-बारी से प्रकाश के चमकीले पूल एक गर्मजोशी भरा स्वागत प्रदान करते हैं। कार्यालय क्षेत्र में रोशनी सामान्य प्रकाश के साथ-साथ टेबल पर स्पॉट लाइटिंग भी प्रदान करनी चाहिए। रीडिंग लाइट उपयोगकर्ता के पीछे बाईं ओर ऊपर की ओर स्थित होनी चाहिए।