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रश्मि बल की गणना और फल

बृहत् संहिता में ‘रश्मि’ नाम से एक केतु (धूमकेतु) का संदर्भ है। रश्मि का अर्थ है “प्रकाश की पहली किरण”। सौर मंडल के सभी ग्रह और चंद्रमा सूर्य के कारण चमकते हुए दिखाई देते हैं क्योंकि वे लगातार सभी दिशाओं में उन सौर किरणों को प्रतिबिंबित कर रहे हैं जो उन्हें प्राप्त होती हैं जो वास्तव में ऊर्जा-पुंज हैं। ये रश्मि या प्रकाश-किरणें विद्युत-चुम्बकीय विकिरण हैं, जिनका सीधा प्रभाव पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्राणियों के जीवन पर पड़ता है।

रश्मि बल की गणना:-

इन खगोलीय पिंडों द्वारा पृथ्वी पर परावर्तित सौर किरणों का प्रभाव उनके पारगमन के दौरान, यानी सूर्य के चारों ओर कक्षीय गति के दौरान उनके द्वारा कवर की गई विशेष राशि या ज्योतिषीय चिह्न के प्रकार और प्रकृति के अनुसार संशोधित हो जाता है। इस प्रकार, जब यह परम उच्च में होता है, तो सूर्य रश्मियों या अधिकतम शक्ति की प्रकाश-किरणें उत्सर्जित करता है।

रश्मि की गणित के लिए गुणांक पर विचार करते हैं। ग्रहों के गुणांक बताए गए हैं जो इस प्रकार है:-

गुणांक सारणी
ग्रह सूर्य चंद्र मंगल बुध बृहस्पति शुक्र शनि अति निर्बल
गुणांक 10 9 5 5 7 8 5 0

 

ग्रह के राशि अंशादि में से उसके परम नीच राशि अंश घटा दें। परिणाम यदि छह राशि से अधिक हो तो इसको 12 राशि में से घटा दें। परिणाम को रश्मि के गुणांक से गुणा करें। परिणाम में 6 का भाग् दें। परिणाम को उच्चादि नियम के आधार पर संशोधित करें। परिणाम में ग्रह की रशमियां आएगी।

विशेष संस्कार:-

 

विशेष संस्कार सारणी
ग्रह उच्च राशि मूल त्रिकोण स्वराशि अधिमित्र मित्र शत्रु अधिशत्रु समग्रही
गुणांक से प्राप्त मान 3 गुणा 2 गुणा 3/2 गुणा 4/3 गुणा 6/5 गुणा ½ गुणा 2/5 गुणा प्राप्त मान

 

रश्मि ज्ञात करने के लिए प्राप्त मान में विशेष संस्कार किए जाते हैं। पराशर द्वारा बृहत् पराशर होरा शास्त्र में वर्णित विधि के अनुसार, ग्रहों के लिए रश्मि की गणना उनके उच्च-नीच राशि-अंश के अनुपात के आधार पर की जाती है, जो मूल्य उनके अपने उच्च बिन्दु  की ओर या उससे दूर जाने पर घटेगा या बढ़ेगा। यदि ग्रह अपनी उच्च राशि में है तो रश्मि–मूल्य को तिगुना किया जाता है; मूलत्रिकोण राशि में  इसे दोगुना किया जाता है, स्वराशि में तीन से गुणा करना और दो से विभाजित करना है;  अपनी अतिमित्र राशि में चार से गुणा करके तीन से भाग करना होता है, मित्र राशि में छह से गुणा करके पांच से भाग करना होता है,  शत्रु राशि में रश्मि मूल्य को आधा किया जाता है, अतिशत्रु राशि में रश्मि-मान को दो से गुणा कर पांच से भाग देना चाहिए परंतु जब ग्रह समराशि में हो तो कोई परिवर्तन नहीं करना चाहिए। इस प्रकार सब ग्रहों की रश्मि निकाल कर सबको योग करना चाहिए | जिस प्रकार ग्रहों में रश्मि निकाली गयी है उसी प्रकार षडबल में भी रश्मि निकाली जाती है। राहु-केतु को छोड़कर सात ज्योतिषीय ग्रहों में से प्रत्येक की रश्मि निकाली जाती है।

 

रश्मि बल के लिए मानसागरी में कहा है कि यदि ग्रह अपनी उच्च राशि में है, तो किसी ग्रह द्वारा प्राप्त रश्मि -मूल्य को तिगुना किया जाना है, यदि वह अपनी राशि या द्वादशांश में है, अतिमित्र राशि में है तो उक्त मान दुगुना होता है, यदि यह दुर्बल हो तो मान 1/16 कम हो जाता है और यदि यह नीचराशि में हो परंतु वक्री गति में हो तो प्राप्त होने वाला रश्मि-मूल्य दुगुना हो जाता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

रश्मि गणित:-

शनि स्पष्ट:          10.10.36.12 कुभ राशि में 10 अंश छत्तीस कला बारह विकला है।

नीच राश्यादि घटाया:  -00.20

———————

शेष :              =09.20.36.12

———————

6 राशि से अधिक है अतः इसे 12 राशि में से घटाया:

12.00.00.00

-09.20.36.12

——————–

2:09.23.48 शेष

———————-

2:09.23.48 x 5 (शनि का गुणांक)= 10.45.115.240

सरल करने पर = 11.16.59.00

शनि जन्म कुंडली में कुम्भ राशि में स्थित है। यह मूल त्रिकोण राशि है। अतः विशेष संस्कार के लिए 2 से गुणा करना है।

गुणनफल आया = 23.03.58

(राशि में 12 का भाग देने पर)

शनि की रश्मि = 11.03.58

इसी प्रकार सभी ग्रहों की रश्मि ज्ञात कर उनका योग कर लेंगे और फिर उनका प्रभाव जानेंगे।

पराशर के अनुसार प्रभाव:-

  • व्यक्ति, भले ही एक अच्छे परिवार में जन्म हो, यदि उस समय सभी ग्रहों द्वारा योगदान की गई रश्मियों का कुल योग पाँच या पाँच से कम हो, तो वह गरीब और दुखी रहेगा।
  • यदि कुल रश्मियों का योग छह और दस के मध्य है तो व्यक्ति गरीब, पत्नी और संतान रहित तथा शारीरिक श्रम करने वाला होगा।
  • ग्यारह रश्मियों वाले व्यक्ति के पास अल्प धन और संतान होगी।
  • बारह रश्मियों वाले व्यक्ति के पास अल्प धन होता है, परंतु वह दुष्ट और मूर्ख होता है।
  • तेरह रश्मियों वाला व्यक्ति चोर होगा।
  • चौदह रश्मियों के साथ व्यक्ति धनवान, विद्वान और परिवार वाला होगा।
  • पंद्रह रश्मियों के साथ व्यक्ति में अच्छे गुण होंगे, वह परिवार का मुखिया और कुशल होगा।
  • सोलह रश्मियों के साथ परिवार में सबसे प्रतिष्ठित होगा।
  • सत्रह रश्मियों के साथ कई लोगों का पालन करने वाला होता है।
  • अठारह रश्मियों के साथ हो तो उसका एक बड़ा परिवार है और उसका पालन-पोषण करता है।
  • उन्नीस रश्मियों के साथ एक अच्छी प्रतिष्ठा अर्जित करता है और प्रसिद्ध हो जाता है।
  • बीस रश्मियों के साथ एक बड़े परिवार और कई रिश्तेदारों के साथ जीवन जीता है।
  • इक्कीस रश्मियों के साथ वह पचास लोगों का पालन-पोषण और सुरक्षा करता है।
  • बाईस रश्मियों के साथ बहुत उदार और दयालु प्रकृति का होता है।
  • तेईस रश्मियों के साथ अच्छी तरह से संस्कृत होता है व प्रसन्न रहता है।
  • यदि कुल रश्मियां चौबीस और तीस के मध्य हैं तो व्यक्ति स्वस्थ, शक्तिशाली और समृद्ध होगा।
  • इकतीस और चालीस के बीच कुल रश्मियों से युक्त व्यक्ति एक सौ से एक हजार व्यक्तियों की मदद करने वाला एक उच्च अधिकारी या मंत्री होगा।
  • इकतालीस और पचास रश्मियों के बीच वह व्यक्ति शासक या राजा होगा।
  • पचास से अधिक के साथ रश्मि वाला व्यक्ति सर्वशक्तिमान शासक होगा।

उपरोक्त परिणाम जन्म के समय व्यक्ति की पारिवारिक व सामाजिक स्थिति के अनुसार प्रभावित होंगे। सभी ग्रहों की सामूहिक रश्मि-बल और उनके प्रभावों को ध्यान में रखे बिना सही भविष्यवाणियां नहीं की जा सकतीं।

मानसागरी के अनुसार:-

  • यदि इस प्रकार प्राप्त रश्मियों का कुल योग एक से पाँच के मध्य है, तो व्यक्ति दुखी, परिवार से रहित, परेशान, दुष्ट, गरीब और भाषण और आचरण में बुरा होगा।
  • यदि वह योग छह और दस रश्मियों के मध्य है, तो व्यक्ति के कोई रिश्तेदार और सहायक मित्र नहीं होंगे, विदेश में या जन्म स्थान से दूर, दुर्भाग्यशाली होगा।
  • यदि ग्यारह और पंद्रह रश्मियों के मध्य व्यक्ति प्रमुख, सम्मानित, सुखी, परिवार का मुखिया और धर्मात्मा होगा।
  • सोलह और बीस रश्मियों के मध्य व्यक्ति बहुत प्रशंसित व गणमान्य होगा और एक उच्च आधिकारिक पद पर आसीन होगा।
  • इक्कीस और पच्चीस रश्मियों के मध्य व्यक्ति एक उज्ज्वल और शक्तिशाली व्यक्तित्व का अधिकारी होगा, साहसी, विद्वान, बहादुर, सफल और प्रसिद्ध होगा।
  • पच्चीस और तीस रश्मियों के मध्य व्यक्ति उच्च, शक्तिशाली एक महत्वपूर्ण और भरोसेमंद पद धारण करेगा या एक निकट सलाहकार या मंत्री बन जाएगा।
  • इकतीस और सैंतीस रश्मियों के मध्य व्यक्ति एक बहुत ही महत्वपूर्ण कमांडिंग पोजीशन रखने वाला शासक व धनवान होगा।
  • और यदि कुल रश्मियाँ सैंतीस से अधिक हो जाती हैं, तो वह व्यक्ति अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली राजा या शासक बन जाएगा।
  • जितनी अधिक रश्मियाँ प्राप्त होंगी व्यक्ति उतना हि उच्च जीवन जीएगा। किसी के जीवन में निम्न या उच्च स्थिति जन्म के समय प्राप्त रश्मियों की कम या अधिक संख्या पर निर्भर करती है।
  • इसी प्रकार मृत्यु के समय प्राप्त रश्मियों की संख्या कम या अधिक होने के आधार पर अधो गति, मध्यमगति या मृतक द्वारा प्राप्त की गई उत्तमगति जानी जा सकती है।
  • यदि प्रश्न के समय अधिक रश्मि-बल वाले पाप ग्रह छठे, आठवें और बारहवें भाव में हों या इन भावों को देख रहे हों तो रोगी जीवित नहीं रहेगा, लेकिन यदि इसी प्रकार शुभ ग्रह हों तो रोगी जीवित रहेगा।

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ग्रहों का गुणांक इस प्रकार है:-

गुणांक सारणी
ग्रह सूर्य चंद्र मंगल बुध बृहस्पति शुक्र शनि अति निर्बल
गुणांक 10 9 5 5 7 8 5 0

 

विशेष संस्कार सारणी
ग्रह उच्च राशि मूल त्रिकोण स्वराशि अधिमित्र मित्र शत्रु अधिशत्रु समग्रही

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कुंडली के विभिन्न भावों में स्थित चंद्रमा का फल

कुंडली के विभिन्न भावों में स्थित चंद्रमा का फल:-

 

जन्म कुंडली के बारह भावों में से जो सबसे ऊपर होता है उसे लग्न भाव कहते हैं। लग्न भाव से घड़ी की उलटी दिशा में चलते रहने से क्रम से दूसरा, तीसरा, चौथा, इस प्रकार से कुल 12 भाव होते हैं। इस प्रकार से पुनः लग्न भाव आ जाता है।

चंद्रमा व्यक्ति के मन का कारक होता है। जन्म कुंडली के जिस भाव में चंद्रमा स्थित होता है व्यक्ति का मन उसी भाव से संबंधित विषयों में अधिक लगा रहता है। आप कुंडली में देखिए कि चंद्रमा कौन से भाव में स्थित है? यदि चंद्रमा सबसे ऊपर के भाव में अर्थात् लग्न भाव में स्थित है तो उसका क्या फल होता है?

 

जन्म लग्न में यदि चंद्रमा स्थित हो तो क्या फल होता है? लग्न स्वयं का द्योतक होता है। अतः व्यक्ति स्वयं के बारे में ही सोचता रहता है और वह भावुक होता है।

द्वितीय भाव में चंद्रमा स्थित होने से व्यक्ति अच्छे रहन-सहन से जीना चाहता है, क्योंकि यह भाव व्यक्ति के रहन-सहन को दर्शाता है।  चंद्रमा पीड़ित या निर्बल होने पर परिवार में मनमुटाव हो सकता है।

तृतीय भाव में चंद्रमा स्थित होने से व्यक्ति ज्ञाता होता है। वह पूर्ण मनोयोग से कार्य करता है। चंद्रमा निर्बल होने पर वह अपने मूड के अनुसार कार्य करता है।

चतुर्थ भाव भावनाओं का होता है। अतः इस भाव में चंद्रमा के स्थित होने पर व्यक्ति भावुक  होता है। भावुकता से कई बार हानि होती है। व्यक्ति का मन अपनी मां की ओर झुका होता है। व्यक्ति अपनी मां से अधिक प्रेम करता है।

पंचम भाव आंतरिक इच्छाओं का होता है। पंचम भाव में चंद्रमा स्थित होने पर व्यक्ति प्रेमी स्वभाव का होता है। वह जुनून से कार्य करता है। व्यक्ति अपनी इच्छानुसार शिक्षा ग्रहण करता है।

छठे भाव में चंद्रमा के स्थित होने पर व्यक्ति के निर्णय लेने की क्षमता में कमी आती है। व्यक्ति शत्रुओं को हावी नहीं होने देता है।

सप्तम भाव में चंद्रमा के स्थित होने पर व्यक्ति आकर्षक व्यक्तित्व वाला होता है। यह व्यापार का भाव भी होता है। अतः व्यक्ति अपने लाभ के बारे में सोचता है। अपने जीवनसाथी से जुड़ाव होता है। ऐसे व्यक्ति व्यापारिक साझेदार से भी मन से जुड़े होते हैं।

अष्टम भाव में चंद्रमा के स्थित होने पर व्यक्ति अकारण ही चिंता करने वाला होता है। वह सावधान भी रहता है और गूढ युक्तियों के द्वारा समस्याओं का समाधान भी करता है।

नवम भाव में चंद्रमा के स्थित होने पर भाग्य में उतार-चढ़ाव रहता है। वह धार्मिक मामलों में  मूडी स्वभाव का होता है। वह अपनी इच्छा अनुसार निर्णय लेता है।

दशम स्थान में चंद्रमा स्थित होने पर व्यक्ति अपने कर्म की ओर अधिक ध्यान देता है। व्यक्ति समाज सेवा के कार्यो में अधिक रुचि लेता है। वह समाज सेवा से प्रतिष्ठा भी प्राप्त करता है।

एकादश भाव में चंद्रमा स्थित होने पर उसकी आय में उतार-चढ़ाव रहता है। आय अवश्य होती रहती है। वह अपने बड़े भाई बहनों से लाभ प्राप्त करता है।

द्वादश भाव में चंद्रमा के स्थित होने पर व्यक्ति पूंजी निवेश में मन लगाता है। वह भावुकता में धन भी खर्च कर देता है। अतः कई बार लोग इनसे लाभ उठाते हैं। अनेक तरह से वह चिंतित हो जाता है।

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Results of the Moon in different houses | विभिन्न भावों में स्थित चंद्रमा का फल |

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राहुल गांधी की माथे की लकीरें। Rahul Gandhi’s forehead lines

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construction according to vastu shastra | वास्तु शास्त्र दिशानुसार निर्माण |

घर में कौन से स्थान पर किस प्रकार का निर्माण होना चाहिए। चार मुख्य दिशाएं होती है और 4 उप दिशाएं होती है इस प्रकार से कुल 8 दिशाएं होती है। पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर ये चार मुख्य दिशाएं है। ईशान, अग्नि, नैऋत्य और वायु ये 4 उप दिशाएं होती है। यदि घर का ईशान कोण सही हो तो बहुत सा वास्तु दोष तो वैसे ही दूर हो जाता है। आइए हम ईशान कोण से ही प्रारंभ करते हैं।
ईशान कोण में मंदिर बनाए। ध्यान कक्ष बनाए। बरामदा बनाना हो तो ईशान कोण में अच्छा रहता है। प्रवेश द्वार भी बनाया जा सकता है। बालकनी ईशान कोण में अच्छी रहती है। भूमिगत पानी की टंकी अर्थात् अंडर ग्राउंड वाटर टैंक  यहां पर बनाना चाहिए। ट्यूबवेल भी बनाना चाहिए।
ईशान कोण मैं टॉयलेट, रसोई घर और  सेप्टिक टैंक भूल कर भी नहीं होना चाहिए। इनका दुष्प्रभाव होता है।

बात करते हैं पूर्व दिशा की। पूर्व दिशा में अध्ययन कक्ष हो सकता है। बैठक अर्थात् ड्राइंग रूम हो सकता है। स्नानघर भी हो सकता है। यथासंभव पूर्व दिशा में खुला स्थान रखें।
अग्नि कोण की बात करते हैं। अग्नि कोण में रसोई घर बनाए। रसोई का स्टोर हो सकता है। तुलसी का पौधा भी यहां लग सकता है। बिजली का मीटर, इनवर्टर, जनरेटर आदि यहां पर लगाएं।
अग्नि कोण में कुआं या तहखाना बिल्कुल भी न बनवाएं। यहां पर अंडरग्राउंड बनाने से दुष्प्रभाव होता है।
दक्षिण दिशा की बात करते हैं। दक्षिण दिशा में सीढियां बनवाई जा सकती है। स्टोर रूम यहां पर हो सकता है। बेडरूम अर्थात् शयनकक्ष यहां पर हो सकता है।
दक्षिण दिशा में कुआ व तहखाना किसी भी हालत में न बनवाएं।

नैऋत्य कोण में मुखिया का शयनकक्ष अर्थात् मास्टर बैडरूम होता है। यहां पर भारी सामान रखें। यहां पर सीढियां बनाई जा सकती है। कपड़े रखने की अलमारी, तिजोरी और श्रृंगार कक्ष संबंधित सामान यहां पर रखा जा सकता है।
इस दिशा में कुआ व अंडर ग्राउंड भूलकर भी न बनाएं।
पश्चिम दिशा में भोजन कक्ष अर्थात् डाइनिंग रूम बनाए। अध्ययन कक्ष  व  बच्चों का  शयनकक्ष भी यहां पर हो सकता है। इस दिशा में छत पर पानी की टंकी रखें या ऊंची बनाए। टॉयलेट और सेप्टिक टैंक भी इस दिशा में बनाया जा सकता है। इस दिशा में कुआ व अंडरग्राउंड न बनाएं।
वायु कोण की बात करते हैं। वायव्य कोण में अन्न भंडार होना चाहिए। यहां पर पशु स्थान होता है। कोई भी पशु गाय, भैंस आदि रखना हो तो यहां पर रखें। यहां पर सेफ्टी टैंक भी बनाया जा सकता है। ड्राइंग रूम भी यहां पर होता है। वायव्य कोण में टॉयलेट भी बनाया जा सकता है। यहां पर पार्किंग बनाई जाती है अर्थात् वाहन खड़े करने की जगह होती है। यहां पर भोजन कक्ष भी बनाया जा सकता है।
उत्तर दिशा में प्रवेश द्वार हो सकता है। ड्राइंग रूम भी हो सकता है। उत्तर दिशा कुबेर जी की दिशा होती है। अतः यहां पर तिजोरी होती है व धन रखा जाता है। इस दिशा में खुला स्थान रखें। स्नानघर भी इस दिशा में हो सकता है।
उत्तर दिशा में शयनकक्ष ना बनाएं।
अब बात करते हैं मध्य स्थान की। इसे ब्रह्म स्थान कहते हैं। इसको यथासंभव खुला रखें। इस स्थान में तुलसी का पौधा लगाया जा सकता है। यह स्थान रोशनी वाला व हवादार होना चाहिए। इस स्थान को साफ सुथरा रखना चाहिए।
इस प्रकार से वास्तु शास्त्र के अनुसार निर्माण करना चाहिए।

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सूर्य रेखा व पर्वत- The Sun line and mount

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शेयर बाजार, कमोडिटी, लॉटरी, सट्टा के हथेली में योग

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संगीत से रोगों का उपचार -Treatment of diseases with music

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विषकन्या योग, वैधव्य योग

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