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कुंडली के विभिन्न भावों में स्थित चंद्रमा का फल

कुंडली के विभिन्न भावों में स्थित चंद्रमा का फल:-

 

जन्म कुंडली के बारह भावों में से जो सबसे ऊपर होता है उसे लग्न भाव कहते हैं। लग्न भाव से घड़ी की उलटी दिशा में चलते रहने से क्रम से दूसरा, तीसरा, चौथा, इस प्रकार से कुल 12 भाव होते हैं। इस प्रकार से पुनः लग्न भाव आ जाता है।

चंद्रमा व्यक्ति के मन का कारक होता है। जन्म कुंडली के जिस भाव में चंद्रमा स्थित होता है व्यक्ति का मन उसी भाव से संबंधित विषयों में अधिक लगा रहता है। आप कुंडली में देखिए कि चंद्रमा कौन से भाव में स्थित है? यदि चंद्रमा सबसे ऊपर के भाव में अर्थात् लग्न भाव में स्थित है तो उसका क्या फल होता है?

 

जन्म लग्न में यदि चंद्रमा स्थित हो तो क्या फल होता है? लग्न स्वयं का द्योतक होता है। अतः व्यक्ति स्वयं के बारे में ही सोचता रहता है और वह भावुक होता है।

द्वितीय भाव में चंद्रमा स्थित होने से व्यक्ति अच्छे रहन-सहन से जीना चाहता है, क्योंकि यह भाव व्यक्ति के रहन-सहन को दर्शाता है।  चंद्रमा पीड़ित या निर्बल होने पर परिवार में मनमुटाव हो सकता है।

तृतीय भाव में चंद्रमा स्थित होने से व्यक्ति ज्ञाता होता है। वह पूर्ण मनोयोग से कार्य करता है। चंद्रमा निर्बल होने पर वह अपने मूड के अनुसार कार्य करता है।

चतुर्थ भाव भावनाओं का होता है। अतः इस भाव में चंद्रमा के स्थित होने पर व्यक्ति भावुक  होता है। भावुकता से कई बार हानि होती है। व्यक्ति का मन अपनी मां की ओर झुका होता है। व्यक्ति अपनी मां से अधिक प्रेम करता है।

पंचम भाव आंतरिक इच्छाओं का होता है। पंचम भाव में चंद्रमा स्थित होने पर व्यक्ति प्रेमी स्वभाव का होता है। वह जुनून से कार्य करता है। व्यक्ति अपनी इच्छानुसार शिक्षा ग्रहण करता है।

छठे भाव में चंद्रमा के स्थित होने पर व्यक्ति के निर्णय लेने की क्षमता में कमी आती है। व्यक्ति शत्रुओं को हावी नहीं होने देता है।

सप्तम भाव में चंद्रमा के स्थित होने पर व्यक्ति आकर्षक व्यक्तित्व वाला होता है। यह व्यापार का भाव भी होता है। अतः व्यक्ति अपने लाभ के बारे में सोचता है। अपने जीवनसाथी से जुड़ाव होता है। ऐसे व्यक्ति व्यापारिक साझेदार से भी मन से जुड़े होते हैं।

अष्टम भाव में चंद्रमा के स्थित होने पर व्यक्ति अकारण ही चिंता करने वाला होता है। वह सावधान भी रहता है और गूढ युक्तियों के द्वारा समस्याओं का समाधान भी करता है।

नवम भाव में चंद्रमा के स्थित होने पर भाग्य में उतार-चढ़ाव रहता है। वह धार्मिक मामलों में  मूडी स्वभाव का होता है। वह अपनी इच्छा अनुसार निर्णय लेता है।

दशम स्थान में चंद्रमा स्थित होने पर व्यक्ति अपने कर्म की ओर अधिक ध्यान देता है। व्यक्ति समाज सेवा के कार्यो में अधिक रुचि लेता है। वह समाज सेवा से प्रतिष्ठा भी प्राप्त करता है।

एकादश भाव में चंद्रमा स्थित होने पर उसकी आय में उतार-चढ़ाव रहता है। आय अवश्य होती रहती है। वह अपने बड़े भाई बहनों से लाभ प्राप्त करता है।

द्वादश भाव में चंद्रमा के स्थित होने पर व्यक्ति पूंजी निवेश में मन लगाता है। वह भावुकता में धन भी खर्च कर देता है। अतः कई बार लोग इनसे लाभ उठाते हैं। अनेक तरह से वह चिंतित हो जाता है।

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Results of the Moon in different houses | विभिन्न भावों में स्थित चंद्रमा का फल |

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राहुल गांधी की माथे की लकीरें। Rahul Gandhi’s forehead lines

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construction according to vastu shastra | वास्तु शास्त्र दिशानुसार निर्माण |

घर में कौन से स्थान पर किस प्रकार का निर्माण होना चाहिए। चार मुख्य दिशाएं होती है और 4 उप दिशाएं होती है इस प्रकार से कुल 8 दिशाएं होती है। पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर ये चार मुख्य दिशाएं है। ईशान, अग्नि, नैऋत्य और वायु ये 4 उप दिशाएं होती है। यदि घर का ईशान कोण सही हो तो बहुत सा वास्तु दोष तो वैसे ही दूर हो जाता है। आइए हम ईशान कोण से ही प्रारंभ करते हैं।
ईशान कोण में मंदिर बनाए। ध्यान कक्ष बनाए। बरामदा बनाना हो तो ईशान कोण में अच्छा रहता है। प्रवेश द्वार भी बनाया जा सकता है। बालकनी ईशान कोण में अच्छी रहती है। भूमिगत पानी की टंकी अर्थात् अंडर ग्राउंड वाटर टैंक  यहां पर बनाना चाहिए। ट्यूबवेल भी बनाना चाहिए।
ईशान कोण मैं टॉयलेट, रसोई घर और  सेप्टिक टैंक भूल कर भी नहीं होना चाहिए। इनका दुष्प्रभाव होता है।

बात करते हैं पूर्व दिशा की। पूर्व दिशा में अध्ययन कक्ष हो सकता है। बैठक अर्थात् ड्राइंग रूम हो सकता है। स्नानघर भी हो सकता है। यथासंभव पूर्व दिशा में खुला स्थान रखें।
अग्नि कोण की बात करते हैं। अग्नि कोण में रसोई घर बनाए। रसोई का स्टोर हो सकता है। तुलसी का पौधा भी यहां लग सकता है। बिजली का मीटर, इनवर्टर, जनरेटर आदि यहां पर लगाएं।
अग्नि कोण में कुआं या तहखाना बिल्कुल भी न बनवाएं। यहां पर अंडरग्राउंड बनाने से दुष्प्रभाव होता है।
दक्षिण दिशा की बात करते हैं। दक्षिण दिशा में सीढियां बनवाई जा सकती है। स्टोर रूम यहां पर हो सकता है। बेडरूम अर्थात् शयनकक्ष यहां पर हो सकता है।
दक्षिण दिशा में कुआ व तहखाना किसी भी हालत में न बनवाएं।

नैऋत्य कोण में मुखिया का शयनकक्ष अर्थात् मास्टर बैडरूम होता है। यहां पर भारी सामान रखें। यहां पर सीढियां बनाई जा सकती है। कपड़े रखने की अलमारी, तिजोरी और श्रृंगार कक्ष संबंधित सामान यहां पर रखा जा सकता है।
इस दिशा में कुआ व अंडर ग्राउंड भूलकर भी न बनाएं।
पश्चिम दिशा में भोजन कक्ष अर्थात् डाइनिंग रूम बनाए। अध्ययन कक्ष  व  बच्चों का  शयनकक्ष भी यहां पर हो सकता है। इस दिशा में छत पर पानी की टंकी रखें या ऊंची बनाए। टॉयलेट और सेप्टिक टैंक भी इस दिशा में बनाया जा सकता है। इस दिशा में कुआ व अंडरग्राउंड न बनाएं।
वायु कोण की बात करते हैं। वायव्य कोण में अन्न भंडार होना चाहिए। यहां पर पशु स्थान होता है। कोई भी पशु गाय, भैंस आदि रखना हो तो यहां पर रखें। यहां पर सेफ्टी टैंक भी बनाया जा सकता है। ड्राइंग रूम भी यहां पर होता है। वायव्य कोण में टॉयलेट भी बनाया जा सकता है। यहां पर पार्किंग बनाई जाती है अर्थात् वाहन खड़े करने की जगह होती है। यहां पर भोजन कक्ष भी बनाया जा सकता है।
उत्तर दिशा में प्रवेश द्वार हो सकता है। ड्राइंग रूम भी हो सकता है। उत्तर दिशा कुबेर जी की दिशा होती है। अतः यहां पर तिजोरी होती है व धन रखा जाता है। इस दिशा में खुला स्थान रखें। स्नानघर भी इस दिशा में हो सकता है।
उत्तर दिशा में शयनकक्ष ना बनाएं।
अब बात करते हैं मध्य स्थान की। इसे ब्रह्म स्थान कहते हैं। इसको यथासंभव खुला रखें। इस स्थान में तुलसी का पौधा लगाया जा सकता है। यह स्थान रोशनी वाला व हवादार होना चाहिए। इस स्थान को साफ सुथरा रखना चाहिए।
इस प्रकार से वास्तु शास्त्र के अनुसार निर्माण करना चाहिए।

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सूर्य रेखा व पर्वत- The Sun line and mount

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शेयर बाजार, कमोडिटी, लॉटरी, सट्टा के हथेली में योग

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संगीत से रोगों का उपचार -Treatment of diseases with music

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विषकन्या योग, वैधव्य योग

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महामृत्युंजय विधान

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