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सिद्ध कुंजिका स्तोत्र
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र अत्यंत ही शक्तिशाली है इसमें अनेक बीजमंत्रों का
समावेश है। इस स्तोत्र के पठन से शत्रुबाधा से मुक्ति प्राप्त होती है। रुद्रयामल के गोरी तंत्र के अंतर्गत इसका वर्णन आया है। भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को बताया गया यह स्तोत्र नवार्ण मंत्र “ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे” पर आधारित है। इस स्तोत्र का पाठ करने से दुर्गा सप्तशती के पाठ करने के बराबर फल प्राप्त होता है।
इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति सुरक्षित होता है और उसकी समस्त बाधाएं दूर होती है। व्यक्ति का आत्मबल बढ़ता है और उसका आध्यात्मिक विकास होता है। इसका पाठ करने से व्यक्ति की सांसारिक इच्छाएं भी पूर्ण होती है। इसके पठन से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं तथा आत्मिक मानसिक और शारीरिक शुद्धि होती है।
दुर्गा सप्तशती के पाठ से पूर्व सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। इसका स्वतंत्र रूप से भी पाठ होता है। यह सिद्ध स्तोत्र है।
इस स्तोत्र का पाठ नवरात्रि व गुप्त नवरात्रि में करना चाहिए। इसके अलावा इसका नियमित पाठ भी किया जा सकता है। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में व सायं काल भी इसका पाठ किया जा सकता है। सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पाठ के साथ किसी पूजा की आवश्यकता नहीं होती है। इस स्त्रोत के पाठ मात्र से सिद्धि प्राप्त होती हैं। कवच, अर्गला, कीलक, रहस्य, सूक्त, ध्यान, न्यास और अर्चन आवश्यक नहीं है। केवल कुंजिका स्तोत्र के पाठ से दुर्गा पाठ का फल प्राप्त होता है।
इसका पाठ करने से मारण, मोहन, वशीकरण, स्तंभन, उच्चाटन आदि सिद्ध होते हैं।
स्नान आदि करने के पश्चात पूर्वाभिमुख आसन पर बैठकर धूप दीप प्रज्वलित कर ले। इस स्तोत्र के 9, 27 या 108 पाठ नित्य करें।
देवी दुर्गा को प्रणाम करके पाठ आरंभ करें और पाठ के पश्चात भी प्रणाम करें।
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र इस प्रकार है:-
॥सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम्॥
शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत् ॥१॥
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥२॥
कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥३॥
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्॥४॥
॥अथ मन्त्रः॥
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा॥
॥इति मन्त्रः॥
नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि॥१॥
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे॥२॥
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥३॥
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥४॥
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥५॥
हुं हुं हुँ हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥६॥
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं।
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥७॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥८॥
इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥
यस्तु कुञ्जिकाया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥
इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम्।