Haridra Ganesh Prayog | हरिद्रा गणेश प्रयोग :-
यदि किसी लड़की या लड़के के विवाह में विलंब हो रहा है या बाधायें आ रही है, संतान प्राप्ति में बधायें आ रही है तो इसके कई कारण हो सकते हैं। यदि जन्म कुंडली में विशेष दोष हो तो विशेष उपाय से ही निवारण हो सकता है। तो क्या उपाय करना चाहिए? इस प्रश्न के उत्तर में एक विशेष प्रयोग के बारे में चर्चा करेंगे जिसका नाम है हरिद्रा गणपती मंत्र प्रयोग। इस मंत्र की पुरश्चरण संख्या अधिक है परंतु यह सरल साधना है और फलदायक है। आप इसे आसानी से सम्पन्न कर सकते है।
इस मंत्र की साधना के लिए उचित मुहूर्त गुरु-पुष्य, रवि –पुष्य, अमृत सिद्धि योग ले सकते हैं। आप भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि से प्रारंभ कर भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तक भी यह प्रयोग सम्पन्न कर सकते है। स्वयं यदि नहीं जानते हैं तो उचित गुरु के मार्गदर्शन में यह प्रयोग करना चाहिए। इस मंत्र की साधना करने से पहले आपको धूप, दीप, गणपती, कलश, षोडश मातृका आदि का पूजन कर लेना चाहिए। उसके बाद गणपति या सर्वतोभद्र मण्डल का पूजन करें। पात्रासादन कर लें। विशेष अर्घ्य पात्र की भी स्थापना कर लें। मण्डूकादि परतत्त्वान्त पीठदेवताओं की स्थापना करके उस पर कलश रखें व उसका पूजन करें। कलश पर हरिद्रा गणपती यंत्र की स्थापना करें। सोने की गणपती की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कर यंत्र पर स्थापित करें।
‘ॐ मं मण्डूकादि परतत्त्वान्त पीठदेवताभ्यो नमः’ इससे पूजा करके नवपीठशक्तियों की इस प्रकार पूजा करे:
पूर्व दिशा से प्रारंभ करते हुए पूजन करें:-
- ॐ तीव्रायै नमः
- ॐ चालिन्यै नमः
- ॐ नन्दायै नमः
- ॐ भोगदायै नमः
- ॐ कामरूपिण्यै नमः
- ॐ उग्रायै नमः
- ॐ तेजोवत्यै नमः
- ॐ सत्यायै नमः
- मध्य में ॐ विघ्ननाशिन्यै नमः।
इस प्रकार पूजा करे। इसके बाद स्वर्णादि से निर्मित यन्त्र या मूर्ति को ताम्रपात्र में रखकर घृत से उसका अभ्यङ्ग करके उसके ऊपर दूध की धारा और जल की धारा डाल कर स्वच्छ वस्त्र से उसे पोछ कर
‘ह्रीं सर्वशक्ति कमलासनाय नमः’
इस मन्त्र से पुष्प आदि का आसन देकर पीठ के बीच स्थापित करके और प्रतिष्ठा करके पाद्यादि पुष्पान्त उपचारों से पूजा करें।
हरिद्रागणेश मन्त्र इस प्रकार है: ॐ हुंगंग्लों हरिद्रागणपतये वर वरद सर्वजनहृदयं स्तम्भय स्तम्भय स्वाहा। इति द्वात्रिंशदक्षयो मन्त्रः ।
यह 32 अक्षरों का मन्त्र है।
पहले विनियोग करें:
अस्य हरिद्रागणनायकमन्त्रस्य मदन ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । हरिद्रागणनायको देवता ममाभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः।
यह बोलकर जल छोड़ें।
अब अंग न्यास कीजिए:-
ऋष्यादिन्यास :
- ॐ मदनऋषये नमः शिरसि
- अनुष्टुप्छन्दसे नमः मुखे
- हरिद्रागणनायकदेवतायै नमः हृदि
- विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे
करन्यासः
- ॐ हूं गंग्लों अंगुष्ठाभ्यां नमः
- हरिद्रागणपतये तर्जनीभ्यां नमः
- वर वरद मध्यमाभ्यां नमः
- सर्वजनहृदयम् अनामिकाभ्यां नमः
- स्तम्भय स्तम्भय कनिष्ठिकाभ्यां नमः
- स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः
हृदयादिषडङ्गन्यास :
- हूं गंग्लों हृदयाय नमः १।
- हरिद्रागणपतये शिरसे स्वाहा
- वर वरद शिखायै वषट्
- सर्वजन हृदयं कवचाय हूँ
- स्तम्भय स्तम्भय नेत्रत्रयाय वौषट्
- स्वाहा अस्त्राय फट्
इस प्रकार न्यास करके ध्यान करे:
पाशांकुशौमोदकमेकदन्तं करैर्दधानंकनकासनस्थम् ।
हारिद्रखण्डप्रतिमं त्रिनेत्रं पीतांशुकं रात्रिगणेशमीडे ॥
पाद्यादि पुष्पान्त उपचारों से पूजा करें।
उसके पश्चात पुष्पाञ्जलि लेकर देवता की आज्ञा लें और आवरण पूजा करे।

पुष्पाञ्जलि लेकर :
ॐ संविन्मयः परेश त्वं परामृतरसप्रिय। अनुज्ञां देहि गणपति परिवारार्चनाय।
यह पढ़कर और पुष्पाञ्जलि देकर ‘पूजितास्तर्पिता संतु’ यह कहें। इस प्रकार आज्ञा लेकर यंत्र के षट्कोणकेसरों में आग्नेयादि चारों दिशाओं और मध्य दिशा में इस प्रकार से पूजन व तर्पण करें।
- ॐ हूं गं ग्लों आं हृदयाय नमः हृदये श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ हरिद्रागणपतये शिरसे स्वाहा शिरसि श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ वर वरद शिखायै वषट् शिखायां श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ सर्वजन हृदयं कवचाय हूँ कवच श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ स्तम्भयस्तम्भय नेत्रत्रयाय वौषट् नेत्रत्रय श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ स्वाहा अस्त्राय फट् श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
इस प्रकार षडङ्गोंकी पूजा करके पुष्पाञ्जलि लेकर “ॐ हुंगंग्लों हरिद्रागणपतये वर वरद सर्वजनहृदयं स्तम्भय स्तम्भय स्वाहा।“ मूलमन्त्रका उच्चारण करके :
‘अभीष्टसिद्धिम् में देहि शरणागतवत्सल।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम् ॥
यह पढ़कर पुष्पाब्जलि देकर विशेषार्घ्य से जल बिन्दु डाल कर ‘पूजितास्तर्पिताः सन्तु’ यह कहे। इति प्रथमावरण ॥
इसके बाद पूज्य और पूजक के अन्तराल को प्राची तथा तदनुसार अन्य दिशाओं की कल्पना करके दाहिने हाथ की तर्जनी और अंगूठे से गन्ध-अक्षत-पुष्प लेकर प्राची क्रम से आठों दिशाओं में:
- ॐ वामायै नमः वामा श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ ज्येष्ठायै नमः ज्येष्ठा श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ रौद्रयै नमः रौद्री श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ काल्यै नमः काली श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ कल-पदादिकायै नमः कलपदादिका श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ विकरिण्यै नमः विकरिणी श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ बलायै नमः बला श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ प्रमथिन्यै नमः प्रमथिनी श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
इससे आठों की पूजा करके देवता के आगे :
- ॐ सर्वभूतदमन्यै नमः सर्वभूतदमनी श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ मनोन्मन्यै नमः मनोन्मनी श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
इस प्रकार पूजा करके चारों दिशाओं में प्राची क्रम से:
- ॐ प्रमोदाय नमः प्रमोद श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ सुमुखाय नमः सुमुख श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ दुर्मुखाय नमः दुर्मुख श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ विघ्ननाशाय नमः विघ्ननाश श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
इससे पूजा करके पुष्पांजलि लेकर मूलमन्त्र का उच्चारण करके :
‘अभीष्टसिद्धिम् में देहि शरणागतवत्सल ।
भक्त्या समर्पये तुभ्यंद्वितीयावरणार्चनम् ॥
यह पढ़कर और पुष्पांजलि देकर ‘पूजितास्तर्पिताः सन्तु’ यह कहे। इति द्वितीयावरण ॥
फिर अष्टदलाग्रों में
- ॐ आं ब्राह्म्यै नमः ब्राह्मी श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ ईं माहेश्वर्यै नमः माहेश्वरी श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ ॐ कौमार्यै नमः कौमारी श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ ऋं वैष्णव्यै नमः वैष्णवी श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ लं वाराह्यै नमः वाराही श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ ऐं इन्द्राण्यै नमः इन्द्राणी श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ औं चामुण्डायै नमः चामुण्डा श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
- ॐ अः महालक्ष्म्यै नमः महालक्ष्मी श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।
इससे आठों की पूजा करे। फिर पुष्पांजलि लेकर मूलमन्त्र का उच्चारण करके :
‘अभीष्टसिद्धिम् में देहि शरणागतवत्सल।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं तृतीयावरणार्चनम् ॥
यह पढ़कर और पुष्पांजलि देकर विशेषार्घ्य से जल बिन्दु डाल कर ‘पूजितास्तर्पिताः सन्तु’ यह कहे। इति तृतीयावरण ॥
इसके बाद भूपुर में पूर्वादि क्रम से इन्द्रादि दश दिक्पालों और वज्रादि आयुधों की पूजा करें। इस प्रकार आवरण पूजा करके धूपादि से नमस्कार पर्यन्त पूजा करके जप करें।
इसका पुरश्चरण चार लाख जप है। हल्दी मिश्रित घृत और चावल से दशांश होम तथा तत्दशांश तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण भोजन कराएं। इस प्रकार करने से मन्त्र सिद्ध हो जाता है। मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर साधक प्रयोगों को सिद्ध करें। चार लाख जप पूरा होने पर हल्दी के चूर्ण से मिश्रित चावलों से दशांश हवन करना चाहिये और फिर क्रमशः तर्पण, मार्जन एवं बाह्मण भोजन कराने से पुरश्चरण पूरा तथा मन्त्र सिद्ध हो जाता है। मन्त्र सिद्ध हो जाने पर साधकों को मनोरथ सिद्ध करना चाहिये।
- शुक्लपक्ष की चतुर्थी को कन्या के द्वारा पीसी हल्दी का शरीर में लेप कर (तीर्थादि के) जल से स्नान कर गणेशजी का पूजन करना चाहिये । फिर तर्पण कर उनके सम्मुख 1008 जप करना चाहिये। घी एवं मालपुआ से 100 आहुतियाँ देकर ब्रह्मचारियों को भोजन कराना चाहिये। कुमारियों एवं अपने गुरु को सन्तुष्ट कर साधक मनोवाञ्छित फल प्राप्त करता है।
- लाजाओं के होम से वधू प्राप्त होती है तथा कन्या को भी अनुरूप वर मिलता है।
- वन्ध्या स्त्री ऋतुस्नान करके गणेशजी का पूजन कर 4 तोला गोमूत्र में दुधवच एवं हल्दी पीस कर 1000 मन्त्रों से अभिमन्त्रित करें। फिर कन्या एवं बटुकों को मोदक खिलाकर उस औषधि को पीकर गुणवान पुत्र प्राप्त करती है।
- इस मन्त्र की उपासना से वाणी स्तम्भन एवं शत्रु स्तम्भन होता है।
- जल, अग्नि, चौर, सिंह एवं अस्त्र आदि के प्रकोप को भी इससे रोका जा सकता है।
अन्य मंत्र:-
शार्ङ्गी (ग) एवं मांसस्थित (ल) में अनुस्वार लगाने से हरिद्रा-गणपति का बीजमन्त्र (ग्लं) बतलाया गया है। इस मन्त्र का पुरश्चरण पूर्वोक्त रीति से करना चाहिये ।
विनियोग ॐ अस्य श्री हरिद्रा गणपति मन्त्रस्य वसिष्ठ ऋषिः, गायत्री छन्दः हरिद्रगणपतिर्देवता, गं बीज लं शक्तिः ममाभीष्ट सिद्धये जपे विनियोगः ।
षडङ्गन्यास :
- ॐ गां हृदयाय नमः
- ॐ गीं शिरसे स्वाहा
- ॐ गूं शिखायै वषट्
- ॐ गैं कवचाय हुम्
- ॐ गौं नेत्रत्रयाय वौषट्
- ॐ गः अस्त्राय फट्
ध्यान:
हरिद्राभं चतुर्बाहुं हरिद्रवसनं विभुम् । पाशांकुशधर देवं मोदकं दन्तमेव च।
पुरश्चरणविधिः इस प्रकार ध्यान करके मानसोपचारों से पूजन कर
विधिवत् शङ्खस्थापन, पीठपूजा, तीव्रादि शक्तियों का पूजन, अङ्गपूजा एवं आवरण पूजा आदि समस्त कार्य पूर्वोक्त रीति के अनुसार करने चाहिये । इस प्रकार 4 लाख जप करे। घी, मधु, शर्करा एवं हरिद्रा मिश्रित चावलों से दशांश होम करना चाहिये। फिर तत्दशांश तर्पण, मार्जन एवं ब्राह्मण भोजन करने से पुरश्चरण पूर्ण होता है। उसके बाद काम्य प्रयोग करें।
इस प्रकार मनोभीष्ट फल देनेवाले ये गणेशजी के मन्त्र बताये गये हैं। दुर्जनों से ये मन्त्र गुप्त रखने चाहिये तथा उन्हें कभी भी नहीं बतलाना चाहिये ।
साधना के क्रम में नित्य कवच पाठ करना चाहिए जो इस प्रकार है:-
अथ हरिद्रा गणेशकवच प्रारम्भः।
ईश्वर उवाच।
शृणु वक्ष्यामि कवचं सर्वसिद्धिकरं प्रिये ।
पठित्वा पाठयित्वा च मुच्यते सर्वसङ्कटात् ॥ 1 ॥
अज्ञात्वा कवचं देवि गणेशस्य मनुं जपेत् ।
सिद्धिर्न जायते तस्य कल्पकोटिशतेरपि ॥ 2 ॥
ॐ आमोदश्च शिरः पातु प्रमोदश्व शिखोपरि ।
सम्मोदो भ्रूयुगे पातु भ्रूमध्ये च गणाधिपः ॥ 3 ॥
गणाक्रीडो नेत्रयुगं नासायां गणनायकः ।
गणक्रीडान्वितः पातु वदने सर्वसिद्धये ॥ 4 ॥
जिह्वायां सुमुखः पातु ग्रीवायां दुर्मुखः सदा ।
विघ्नेशो हृदये पातु विघ्नानाथश्च वक्षसि ॥ 5 ॥
गणानां नायकः पातु बाहुयुग्मं सदा मम।
विघ्नकर्ता च ह्युदरे विघ्नहर्ता ष लिङ्गके ॥ 6 ॥
गजवक्त्रः कटोदेशे एकदन्तो नितम्बके ।
लम्बोदरः सदा पातु गुह्यदेशे ममारुणः ॥ 7 ॥
व्यालयज्ञोपवीती मां पातु पादयुगे सदा ।
जापकः सर्वदा पातु जानुजङ्घ गणाधिपः ॥ 8 ॥
हरिद्रः सर्वदा पातु सर्वाङ्ग गणनायकः ।
य इदं प्रपठेन्नित्यं गणेशस्य महेश्वरि ॥ 9 ॥
कवचं सर्वसिद्धाख्यं सर्वविघ्नविनाशनम् ।
सर्वसिद्धिकरं साक्षात्सर्वपापविमोचनम् ॥ 10 ॥
सर्वसम्पत्प्रदं साक्षात्सर्व पापविमोक्षणम् ।
सर्वसम्पत्प्रदं साक्षात्सर्वशत्रुक्षयं करम् ॥ 11 ॥
ग्रहपीडा ज्वरा रोगा ये चान्ये गुह्यकादयः ।
पठनाद्धा-रणादेव नाशमायान्ति तत्क्षणात् ॥ 12 ॥
धनधान्यकरं देवि कवचं सुरपूजितम् ।
समं नास्ति महेशानि त्रैलोक्ये कवचस्य च ॥ 13 ॥
हारिद्रस्य महेशानि कवचस्य च भूतले ।
किमन्यैरसदाला पैयंत्रायुयं-यतामियात ॥ 14 ॥
इति विश्वसारतन्त्रे हरिद्रागणेशकवचं समाप्तम् ।
हरिद्रा गणेश कवच : ईश्वर बोले हे प्रिये! समस्त सिद्धियों कोदेनेवाला कवच मैं तुम्हें बता रहा हूं तुम उसे सुनो। इसे पढ़कर और पढ़ा-कर मनुष्य सभी संकटों से मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य गणेश के कवच को बिना जाने उनके मन्त्र का जप करता है उसे करोड़ों कल्पों तक भी सिद्धि नहीं प्राप्त होती ।
हे महेश्वरि ! जो मनुष्य सब विध्नों के नाशक इस सर्वसिद्धि नामक, सर्वसिद्धियों को देनेवाले, साक्षात् पाप से छुड़ानेवाले, सर्वसम्पत्तियों को देनेवाले, समस्त शत्रुओं के साक्षात् विनाशक इस स्तोत्र को पढ़ता है उसकी ग्रहपीड़ायें, ज्वरादि रोग, या जो गुह्यकादि बाधक होते हैं वे सब तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं। हे देवि ! यह कवच धन-धान्य को देनेवाला और देवताओं द्वारा पूजित है। हे महेशानि ! इस कवच के समान तीनों लोकों में अन्य कोई नहीं है। हे महेशानि ! इस भूतल पर हरिद्रागणेश के अतिरिक्त अन्य अनेक असत्य कथनों से क्या लाभ ? क्योंकि उससे व्यर्थ आयु का क्षय होता है।
विश्वसार तन्त्रोक्त हरिद्रागणेश कवच समाप्त ।