घाघ- भड्डरी की कहावतें:-
घाघ के जन्मकाल एवं जन्मस्थान के संबंध में बड़ा मतभेद है। इनकी जन्मभूमि कन्नौज के पास चौधरी सराय नामक ग्राम बताई जाती है। शिवसिंह सरोज का मत है कि इनका जन्म सं. 1753 में हुआ था, किंतु पं. रामनरेश त्रिपाठी ने बहुत खोजबीन करके इनके कार्यकाल को सम्राट् अकबर के राज्यकाल में माना है। कन्नौज के पास चौधरीसराय नामक ग्राम के रहने वाले घाघ के ज्ञान से प्रसन्न होकर सम्राट अकबर ने उन्हें सरायघाघ बसाने की आज्ञा दी थी। यह जगह कन्नौज से एक मील दक्षिण स्थित है। भड्डरी घाघ कवि की पत्नी थीं। घाघ-भड्डरी की वर्षा संबंधी लोकप्रिय कहावतें बहुत सहायक है। गावों में आज भी बहुत से व्यक्ति इन कहावतों को जानते हैं और बरसात का आकलन करते है। इस विषय पर हमारा एक विडिओ इस चैनल पर पहले से ही उपलब्ध है। आज के विडिओ की शृंखला राजस्थान के बारे में क्षेत्रीय भाषा में है। विडिओ कई भागों में है। आप सभी भाग देखकर लाभ उठा सकते हैं।
[1]
ईसानी।
बिसानी।।
–ईशान कोन में यदि बिजली चमके, तो पैदावार अच्छी होगी ।
[ 2 ]
अगस्त ऊगा।
मेह पूगा॥
–अगस्त तारा उदय होने पर बरसात का अंत समझना चाहिये ।
[ 3]
परभाते मेह डंवरा, साँजे सीला बाव।
डंक कहै हे भड्डुली, काला तणा सुभाव।।
–डंक भड्डुली से कहता है कि यदि प्रातःकाल मेघ भागे जा रहे हों और शाम को ठंडी हवा चले, तो समझना चाहिये कि अकाल पड़ेगा।
[4 ]
ऊगन्तेरो माछलो, अथन्व तेरी मोग।
डंक कहै हे भड्डुली, नहिंयाँ चढ़सी गोग।।
–यदि प्रातःकाल इन्द्रधनुष हो और संध्या को सूर्य की किरणें लाल दिखाई पड़ें, तो समझना चाहिये कि नदियों में बाढ़ आयेगी ।
[ 5 ]
आभा राता।
मेह माता।।
–आकाश लाल हो, तो वर्षा बहुत हो ।
[6 ]
आभा पीला।
मेह सीला।।
–आकाश पीला हो, तो वर्षा कम हो।
[7]
दुश्मन की किरपा बुरी, भली मित्र की त्रास।
आड़ंग कर गरमी करै, जद बरसन की आस।।
–शत्रु की कृपा की अपेक्षा मित्र की डान्ट-डपट अच्छी है। जब कड़ाके की गरमी पढ़ती है और पसीना नहीं सूखता, तब वर्षा की आशा होती है।
[8 ]
सवारो गाजियो, नै सापुरस रो बोलियो -एल्यो नही जाय।।
–सबेरे का गरजना और सत्पुरुष का वचन निष्फल नहीं जाता।
[ 9 ]
पानी पाला बादसा, उत्तर सूँ आवै।
–पानी, पाला और बादशाह उत्तर ही से आया करते हैं।
[10]
परभाते मेह डंबरा,
दोफाराँ तपन्त ।
रातू तारा निरमला,
चेला करो गछंत।।
–प्रातःकाल मेघ दौड़े, दोपहर को धूप कही हो और रात को निर्मल आकाश में तारे दिखाई पड़े, तो अकाल पड़ेगा, वहाँ से अपना रास्ता लेना चाहिये ।
[ 11]
बिंभलियाँ बोलै रात निमाई।
छाली बाडाँ बेस छिकाई।।
गोहाँ राग करै गरणाई।
जोराँ मेह मोराँ अजगाई।।
–यदि रात भर झींगुर बोले, बकरी बाड़ के पास बैठकर छींके, गाय ज़ोर से आवाज़ करे और मोर बोले, तो वर्षा होगी।
[ 12 ]
जिण दिन नीली बले जवासी।
माँडे राड साँपरी मासी।।
बादल रहे रातरा वासी।
तो जाणो चौकस मेह आसी।।
–यदि हरा जवासा जल जाय, बिल्लियाँ लड़े और रात के बादल सबेरे तक रहें, तो समझना चाहिये कि वर्षा अवश्य आयेगी ।
[ 13]
बिरछाँ चढ़े किरकाँट बिराजे।
स्याह हफेत लाल रंग साजे।।
बिजनस पवन सूरियो बाजे।
घड़ी पलक माँहे मेह गाजे।।
–यदि गिरगिट पेड़ पर बैठकर काला-सफेद या लाल रंग धारण करे और वायु उत्तर पश्चिम से चले, तो घड़ी दो घड़ी में वर्षा आयेगी ।
[ 14]
ऊँचो नाग चढ़े तर ओडे।
दिस पिछमाँण बादला दौड़े।।
सारस चढ़ असमान सजोडे।
तो नदियाँ ढाहा जल तोड़े।।
–यदि साँप पेड़ की चोटी पर चढ़े, मेघ पश्चिम दिशा को दौड़े और सारसों के जोड़े आकाश में उड़ें, तो नदी का जल किनारे को तोड़ कर बहेगा ।
[15]
ऊमस कर घृत माठ जमावै।
ईडा कीड़ी बाहर लावै॥
नीर बिना चिड़िया रज न्हावै।
मेह बरसे घर माँह न मावै।।
–यदि गर्मी से घी पिघल जाय, चींटियाँ अपना अंडा बाहर निकालें और चिड़ियाँ रेत में नहाये, तो इतना पानी बरसेगा कि घर में नहीं समायगा ।
[16]
जटा बधे बड़री जद जाँणा।
बादल तीतर पंख बखाणाँ।।
अवस नील रँग है असमाणाँ।
घण बरसे जल रो घमसाणाँ॥
–जब बरगद की जटा बढ़ने लगे, बादल का रंग तीतर के पंख की तरह हो जाय, और आकाश का रंग गहरा नीला हो जाय, तब घमासान वर्षा होगी।
[17]
गले अमल गुलरी हुवे गारी।
रबि सिसरे दोली कुंडारी॥
सुरपत धनख करै बिध सारी।
एरापत मघवा असवारी।।
–यदि अफ़ीम गलने लगे, गुड़ में पानी छूटने लगे, सूर्य और चन्द्रमा के चारों ओर कुण्डल हो, इन्द्रधनुष पूरा दिखाई दे, तो इन्द्र ऐरावत की सवारी पर आयेगा ।
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[18]
पवन गिरी छूटै परवाई।
ऊठे घटा छटा चढ़ आई।।
सारो नाज करै सरसाई।
धर गिर छोलाँ इन्द्र धपाई।।
–यदि पूर्व से हवा चले, बिजली की चमक के साथ बादल चढ़े तथा नाज हरा होने लगे, तो भूमि और पर्वत को इन्द्र पानी से अघा देंगे।
[19]
चैत चिड़पड़ा।
सावन निरमला।।
–यदि चैत्र में छोटी-छोटी बूंदें गिरें, तो सावन में वर्षा बिल्कुल न होगी ।
[ 20]
जेठ मूँगा।
सदा सूँगा।।
–यदि जेठ में अन्न महँगा हो, तो वर्ष भर सस्ता ही रहेगा ।
[ 21]
चैत मास नै पख अँधियारा।
आठम चौदस दो दिन सारा।।
जिण दिस बादल जिण दिस मेह।
जिण दिस निरमल जिण दिस खेह।।
–चैत्र के कृष्णपक्ष की अष्टमी और चतुर्दशी को जिस दिशा में बादल होंगे, उस दिशा में बरसात में वर्षा अच्छी होगी, और जिस दिशा में बादल न होंगे, उस दिशा में धूल उड़ेगी।
[22]
जेठा अंत विगाड़िया,
पूनम नै पड़वा।
–यदि जेठ की पूर्णिमा और आषाढ़ की प्रतिपदा को छींटें पड़े, तो लक्षण अच्छा नहीं।
[23]
जेठ बीती पहली पड़वा, जो अम्बर धरहड़े।
असाढ़ सावन जाय कोरो, भाद्रवे बिरखा करै॥
–आषाढ़ की प्रतिपदा को यदि बादल गरजे या वर्षा हो, तो आषाढ़ और सावन सूखे जायेंगे और भादों में वर्षा होगी ।
[ 24]
आसाढै सुद नौमी, घन बादल घन बीज।
कोठा खैर खखेर दो, राखौ बलद ने बीज।।
–आषाद सुदी नवमी को यदि बादल घना हो और खूब बिजली चम-कती हो, तो ज़माना अच्छा होगा। कोठिला खाली कर दो। सिर्फ बोने के जिये बीज और बैल रक्खेो ।
[ 25]
आसाढ़े सुद नवमी, नै बादल नै बीज।
हल फाड़ो ईंधन करो, बैठा चाबो बीज।।
–आषाढ़ सुदी नवमी को यदि बादल और बिजली न हो, तो हल को तोड़कर जला दो और बैठे-बैठे बीज को चबा जाओ। क्योंकि वर्षा नहीं होगी।
[ 26]
सावण पहली पंचमी, मेह न माँडे आल।
पीउ पधारो मालवे, मैं जासां मोसाल।।
–सावन बदी पंचमी तक यदि बादल बरसना प्रारम्भ न करे, तो हे पति ! तुम मालवे चले जाना, मैं अपने पीहर चली जाऊँगी। क्योंकि अकाल पड़ेगा ।
[ 27]
सावण बदी एकादसी, तीन नखत्तर जोय।
कृतिका होवे किरवरो, रोहन होय सुगाल॥
टुक यक आवै मिरगली, पडै अचिन्त्यौ काल।।
–सावन बदी एकादशी को तीन नक्षत्र देखो यदि कृत्तिका हो, तो वर्षा मामूली हो; रोहिणी हो, तो सुकाल हो; और यदि
मृगसिरा हो, तो ऐसा अकाल पड़ेगा, जैसा किसी ने सोचा भी नहीं होगा।
[ 28]
सावण पहले पाख में, जे तिथ ऊणी जाय।
कैयक कैयक देस में, टावर बेचै माय।।
–सावन के पहले पक्ष में यदि कोई तिथि टूट जाय, तो किसी-किसी देश में ऐसा अकाल पड़ेगा कि माताएँ अपने बच्चे बेंचेंगी ।
[ 29]
सावण पहली पंचमी, झीनो छाँट पड़े।
डंक कहै हे भडुली, सफलाँ रून्ख फलै।।
–यदि सावन बदी पंचमी को छींटें पड़े, तो डंक भडली से कहते हैं कि दृष्टि अच्छी होगी और वृक्षों में फल आयेंगे ।
[ 30]
सावण पहिली पंचमी, जो बाजे बहु बाय।
काल पड़े सहु देस में, मिनख मिनख नै खाय।।
–सावन बदी पंचमी को यदि गहरी हवा चले, तो देश भर में ऐसा अकाल पड़ेगा कि आदमी को आदमी खा जायगा ।
[ 31]
आसोजां रा मेहड़ा, दोय बात विनास।
बोरड़ियाँ बोर नहिँ, बिणयाँ नहीं कपास।।
–आश्विन में यदि वर्षा हो, तो दो प्रकार की हानि होगी बेर की झाड़ियों में बेर नहीं लगेंगे और कपास में रुई न लगेगी ।
[ 32]
आसवाणी।
भागवाणी।।
–आश्विन में वर्षा भाग्यवानों के यहाँ होती है।
[ 33]
सासू जितरै सासरो।
आसू जितरै मेह।।
–जब तक सास जीती रहती है, तब तक ससुराल का सुख है। इसी प्रकार आश्विन तक वर्षा की आशा रहती है।
[ 34]
काती सब साथी।।
–कार्तिक में सब फसलें साथ पकती हैं।
[ 35]
दीवाली रा दीया दीठा।
काचर बोर मतीरा मीठा॥
–दिवाली का दिया दिखाई देने तक कचरी, बेर और तरबूज़ मीठे हो जाते हैं।
[ 36]
काती रो मेह,
कटक बराबर।
–कार्तिक की वर्षा खेती के लिये वैसी ही हानिकारक है, जैसी सेना दुश्मन के लिए।
[ 37]
मिंगसर बद वा सुद मँहीं, आधे पोह उरे।
भँवरा धुंध मचाय दे, तो समियो होय सिरे॥
–यदि अगहन के कृष्ण या शुक्लपक्ष में या पौष के पहले पक्ष में यदि प्रातःकाल धुन्धला हो, तो ज़माना अच्छा होगा।
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[ 38]
मिंगसर बद वा सुद महीं, आधे पोह उरे।
धुंवर न भीजे धूल तो, करसण काहे करे।।
–अगहन बदी या सुदी में या पौष बदी में मिट्टी ओस से गीली न हो, तो भूमि क्यों बोई जाय? अर्थात् उपज अच्छी न होगी ।
[ 39]
पोह सबिंभल पेखजे, चैत निरमलो चंद।
डंक कहै हे भडुली, मण हूत्ता अन मंद॥
–पौष में यदि गहरे बादल दिखाई पड़े और चैत्र में चन्द्रमा स्वच्छ दिखाई पड़े, तो डंक भङ्डली से कहता है कि अन्न रुपये के एक मन से भी सस्ता हो जायगा ।
[ 40]
बरसे भरणी।
छोड़े परणी।।
–यदि भरणी नक्षत्र में बरसात हो, तो परिणीता (विवाहिता स्री) को छोड़ना पड़ेगा। अर्थात् विदेश जाना पड़ेगा ।
[ 41]
किरती एक जबूकड़ो,
ओगन सह गलिया।
–कृतिका नक्षत्र (9 से 22 मई तक) की बिजली की एक चमक भी पहले के सब अपशकुनों का नाश कर देती है।
[42]
रोहन रेली। रुपया री अधेली।।
–रोहिणी में वर्षा हो, तो फ़सल रुपये की अठन्नी भर रह जायगी ।
[ 43 ]
पहली रोहन जल हरै, बीजी बहोतर खाय।
तीजी रोहन तिण हरै, चौथी समन्दर जाय।।
–यदि पहली रोहिणी में वर्षा हो, तो अकाल पड़े; दूसरी में बहत्तर दिन तक सूखा पड़े; तीसरी में घास न उगे और चौथी में मूसलधार वर्षा हो ।
[ 44 ]
रोहन तपै नै मिरगला बाजै।
अदरा मैं अनचीतियो गाजै।।
–रोहिणी में कड़ाके की गरमी पड़े, मृगशिरा में आँधी चले, तो आर्दा में मेघ खूब गरजेगा ।
[ 45 ]
रोहन बाजै मृगला तपै।
राजा जूझे परजा खपै।।
–यदि रोहिणी नक्षत्र में आँधी चले और मृगशिरा में खूब धूप हो, तो राजा लोग लड़ेंगे और प्रजा का नाश होगा।
[ 46 ]
मिरगा बाव न बाजियो,
रोहन तपी न जेठ।
केनै बाँधो झुँपड़ो,
बैठो बड़लै हेठ।।
–यदि मृगशिरा में हवा न चले, और जेठ में रोहिणी नक्षत्र में कड़ाके की धूप न हुई, तो झोपड़ा क्यों बनाते हो? बरगद के नीचे बैठ जाओ। अर्थात् अकाल पड़ने से दूसरे स्थान को जाना होगा ।
[ 47 ]
द्वै मूसा है द्वै कातरा, द्वै टीडी द्वै ताव।
दोयाँ री बादी जल हरै, द्वै बीसर द्वै बाव॥
–यदि मृगशिर के प्रथम दो दिनों में हवा न चले, तो चूहे पैदा हों। तीसरे चौथे दिन हवा न चले, तो गुबरीले पैदा हों। पाँचवें छठे दिन हवा न चले, तो टीड़ी पैदा हों। सातवें आठवें दिन हवा न चले, तो ज्वर फैले। नवें दसवें हवा न चले, तो वर्षा कम हो। ग्यारहवें बारहवें हवा न चले, तो ज़हरीले कीड़े पैदा हों और तेरहवें चौदहवें हवा न चले, तो खूब आँधी चले ।
[ 48 ]
पहली आद टपूकड़े,
मासाँ पाखाँ मेह।
–यदि आर्द्रा के प्रारम्भ में बूँदें पड़ जायें, तो महीने पखवाड़े में वर्षा हो।
[ 49 ]
आदरा बाजे बाय।
झून्पड़ी जोला खाय॥
–आर्द्रा में हवा चले, तो झोपड़ी डाँवाडोल हो जाय। अर्थात् अकाल पड़े और घर छोड़ना पड़े।
[ 50]
एक आदरयो हाथ लग जाय,
पछै तो जाट राजी।
–आर्द्रा में एक बार भी वर्षा हो जाय, तो जाट (किसान) प्रसन्न हो जाय ।
[ 51 ]
आदरा भरै खाबड़ा, पुनरबसु भरै तलाव।
नै बरस्यो पुखै, तो बरसही घणा दुखै।।
–आर्द्रा में वर्षा हो, तो गड्डे पानी से भर जायेंगे। पुनर्वसु में बरसे, तो तालाब भर जाय और यदि पुष्य में न बरसे, तो फिर कठिनता से बरसेगा ।
[ 52 ]
असलेखा बूँठा,
बैदा घरे बधावना।
–अश्लेषा में वर्षा हो, तो वैद्यों के घर बधाई बजे अर्थात् रोग खूब फैलेगा ।
[ 53 ]
मघा माचन्त मेहा ।
नही तो उड़ंत, खेहा॥
–मघा में यदि बरसे, तो ठीक, नहीं तो धूल उड़ेगी ।
[ 54 ]
मघा मेह माचन्त।
नहीं तो गच्छन्त।।
–मघा में या तो वर्षा होगी, या मेघ चले जायेंगे ।
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[ 55 ]
भाद्रवे जग रेलसी, जे छट अनुराधा होय।
डंक कहै हे भड्डली, चिन्ता करौ न कोय।।
–यदि भादों बदी छठ को अनुराधा हो, तो वर्षा खूब होगी। डंक कहता है- हे भड्डरी ! चिन्ता न करो।
[ 56 ]
आखा रोहन बायरी, राखी स्रवन न होय।।
पोही मूल न होय तौ, महि डोलन्ती जोय।।
–अक्षय तृतीया को रोहिणी न हो, रक्षाबन्धन पर श्रवण न हो और पौष की पूर्णिमा को मूल न हो, तो पृथ्वी काँप उठेगी ।
[ 57 ]
चित्रा दीपक चेतवे, स्वाते गोबरधन्न।
डंक कहै हे भइली, अथग नीपजे अन्न।।
–यदि चित्रा में दीवाली हो, और गोवर्धन पूजा के समय स्वाती हो, त्तो डंक भडुली से कहता है कि अन्न की उपज बहुत होगी।
[ 58 ]
स्वाते दीपक प्रजले, बिसाखा पूजे गाय।
लाख गयन्दा धड़ पड़े, या साख निस्फल जाय।।
–यदि दीवाली स्वाती नक्षत्र में हो, और दूसरे दिन गोपूजन के समय बिशाखा हो, तो लड़ाई होगी; जिसमें लाखों हाथी मारे जायेंगे, या फ़सल निष्फल होगी ।
[ 59 ]
दीवा बीती पंचमी, सोम सुकर गुरु मूल।
डंक कहै हे भडुली, निपजे सातो तूल।।
–कार्तिक सुदी पंचमी को यदि मूल नक्षत्र में सोमवार, शुक्रवार या बृहस्पतिवार पड़े, तो डंक भडुली से कहता है कि सातो प्रकार के अन्न उत्पन्न होंगे ।
[ 60-61 ]
काती पूनम दिन कृति, चंद मधाने जोय।
आगे पीछे दाहिने, जिणसूं निश्चय होय।।
आगे हूवै तो अन्न नहीं, पासे हूवै तो ईत।
पीठ हुयाँ परजा सुखी, निस दिन रह्यो नचीत।।
–कार्तिक की पूर्णमासी को देखो कि चन्द्रमा का मध्य किस तरफ है, आगे है या पीछे या दाहिने ? उनसे निश्चय होगा कि यदि आगे होगा, तो अन्न नहीं उपजेगा; दाहिने होगा तो ईतिभीति होगी और यदि पीछे होगा तो प्रजा सुखी रहेगी और रात-दिन निश्चिन्त रहना ।
* अतिवृष्टि, अनावृष्टि, चूहे, टिड्डी, पक्षी और राज-विद्रोह, ये छः ईति कहते हैं।
[ 62 ]
माहे मंगल जेठ रवि, भादरवै सनि होय।
डंक कहै है भड्डली, बिरला जीवै कोय।।
–यदि माघ में पाँच मंगल, जेठ में पाँच रविवार और भादों में पाँच शनिवार पड़े, तो डंक भड्डली से कहता है कि ऐसा अकाल पड़ेगा कि शायद ही कोई जीवित बचे ।
[ 63 ]
सावण मास सूरियो बाजै, भादरवे परवाई।
आसोजाँ में समदरी बाजै, काती साख सवाई।।
–यदि श्रावण में उत्तर पश्चिम की हवा चले, भादों में पूर्वा, और कुवार में पश्चिम की हवा चले, तो कार्तिक में फसल अच्छी हो ।
[ 64 ]
पवन बाजै पूरियो।
हाली हलावकीम पूरियो।।
–यदि उत्तर पश्चिम की हवा चले, तो किसान को नई ज़मीन में हल नहीं चलाना चाहिये। क्योंकि वर्षा जल्दी ही आनेवाली है।
[ 65 ]
आधे जेठ अमावस्या, रिव आथिम तो जोय।
बीज जो चंदो ऊगसी, तो साख भरेला सोय।।
उत्तर होय तो अति भलो, दक्खन होय दुकाल।
रवि माथे ससि आथये, तो आधो एक सुगाल।।
–जेठ की अमावस्या को जहाँ सूर्योदय होता है, उस स्थान को याद रक्खो । यदि जेठ सुदी द्वितीया का चन्द्रमा उस स्थान से उत्तर में हो, तो ज़माना अच्छा होगा; दक्षिण में होगा, तो अकाल पड़ेगा; और यदि उसी स्थान पर होगा, तो समय साधारण होगा ।
[ 66 ]
आसाड़े धुर अष्टमी, चन्द उगन्तो जोय।
कालो वै तो करवरो, धोलो वै तो सुगाल।।
जे चंदो निर्मल हवै, तो पड़ै अचिन्त्यो काल।।
–आषाढ़ बदी अष्टमो को उदय होते हुए चन्द्रमा की ओर देखो, यदि वह काले बादलों में हो, तेा समय साधारण होगा; यदि सफेद बादलों में होगा, तो समय अच्छा होगा; और यदि बादल नहीं होगा, तो निश्चय अकाल पड़ेगा।
[ 67 ]
सोमाँ सुकरौँ सुरगुराँ, जे चन्दो ऊगन्त।
डंक कहै हे भड्डली, जल थल एक करन्त।।
–यदि आषाढ़ में चन्द्रमा सोमवार, शुक्रवार या गुरुवार को उदय हो, सो डंक भड्डली से कहता है कि ऐसी वृष्टि होगी कि जल और थल एक हो जायेंगे ।
[ 68 ]
सावन तो सूतो भलो,
ऊभो भलो असाढ़।।
–द्वितीया का चन्द्रमा सावन में सोता हुआ अच्छा है और आषाढ़ में खड़ा हुआ ।
[ 69 ]
मंगल रथ आगे हुवै, लारे हुवै जो भान।
आरँभिया यूँ ही रहै, ठाली रवै निवाण।।
–यदि सूर्य के आगे मंगल हो, तो सारी आशाओं पर पानी फिर जायगा और तालाब सूखे पड़े रहेंगे।
[ 70 ]
सोमाँ सुकरौं बुध गुराँ, पुरबाँ धनुस तणै।
तीजै चौथै देहरै, समदर ठेल भरै।।
–यदि सोम, शुक्र, बुध और गुरुवार को पूर्व दिशा में इन्द्रधनुष तने, तो उसके तीसरे-चौथे दिन इतनी वृष्टि होगी कि समुद्र भर जायगा ।
[ 71 ]
रार करो तो बोलो आड़ा।
कृषी करो तो रक्खो गाड़ा।।
–यदि झगड़ा करना हो, तो एड़ी-बैंड़ी बात बोलो। और यदि खेती करना हो, तो गाड़ी रक्खो ।
[ 72 ]
जो तेरे कंता धन घना, गाड़ी कर ले दो।
जो तेरे कंता धन नहीं, कालर बाड़ी बो॥
–हे स्वामी ! यदि तुम्हारे पास अधिक धन हो, तो दो गाड़ियाँ बनवा लो; और यदि धन न हो, तो बाड़ी में कपास बो दो ।
[73 ]
चैत मास उजियाले पाख।
नव दिन वीज लुकोई राख।।
आठम नम नीरत कर जोय।
जाँ बरसे जाँ दुरभख होय।।
–चैत्र शुक्ल में प्रतिपदा से नवमी तक यदि बिजली न चमके, अष्टमी और नवमी को ख़ास तौर पर देखना चाहिये तो जहाँ वर्षा हो, वहाँ अकाल पड़ेगा ।
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