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धन भाव का प्रभाव: Effects of Dhan Bhava
- कुंडली में 1,4,7,10 भाव को केंद्र भाव कहते हैँ।
- कुंडली में 1,5,9 भाव को त्रिकोण भाव कहते हैं।
- इसलिए लग्न या प्रथम भाव शक्तिशाली होता है क्योंकि यह केंद्र और त्रिकोण दोनों है।
- केंद्र शक्ति केंद्र हैं क्योंकि प्रत्येक केंद्र भाव किसी के जीवन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा दर्शाता है।
केंद्र 1 – लग्न –स्वयं
केंद्र 4 – संपत्ति
केंद्र 7 – जीवनसाथी
केंद्र 10 – करियर, कर्म
त्रिकोण भाव 1,5,9 होते हैं और इन्हें लक्ष्मी स्थान के रूप में भी जाना जाता है।
त्रिकोण 1 – वर्तमान, स्वयं
त्रिकोण 5 – प्रारब्ध, संतान
त्रिकोण 9 – भविष्य, पिता
- जब बृहस्पति या शुक्र जैसा एक बलवान शुभ ग्रह केंद्र या त्रिकोण में स्थित होता है तो यह उस भाव को दृढ़ता से प्रभावित करता है और अन्य केंद्र या त्रिकोण भावों को देखता है और व्यक्ति के जीवन को बढ़ाता है।
- केंद्र भाव पहला, चौथा, सातवां और दसवां भाव हैं।इन्हें विष्णु स्थान भी कहा जाता है अर्थात जहां भगवान विष्णु निवास करते हैं। 5वां और 9वां भाव त्रिकोण भाव हैं। प्रथम भाव की गणना भी त्रिकोण में की जाती है। यह देवी लक्ष्मी का भाव है। इसलिए जब भी केंद्र और त्रिकोण भाव के बीच शुभ संबंध होता है तो इसे भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी के बीच संबंध माना जाता है क्योंकि वे दोनों एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते हैं। ऐसी स्थिति में कोई ग्रह बहुत अच्छी स्थिति में होगा या कोई शुभ योग बनेगा।
धन भाव का प्रभाव:
- यदि धन भाव का स्वामी धन भाव में हो, केंद्र में हो या त्रिकोण में हो तो वह व्यक्ति को प्रगति देता है।
यदि वह 6,8,12 भाव में हो तो आर्थिक स्थिति में गिरावट आती है।
- धन भाव में शुभ ग्रह धन प्रदान करता है जबकि अशुभ ग्रह धन को नष्ट करता है।
- यदि गुरु धन भाव का स्वामी होकर धन भाव में हो या मंगल के साथ हो तो व्यक्ति धनवान होता है।
- यदि धन भाव का स्वामी लाभ भाव में हो और लाभ भाव का स्वामी धन भाव में हो तो जातक को धन की प्राप्ति होती है।
- यदि धन भाव का स्वामी केंद्र में हो और लाभ भाव का स्वामी त्रिकोण में हो तथा गुरु और शुक्र के साथ युति हो या दृष्ट हो तो जातक धनवान होता है।
- यदि धन भाव का स्वामी दु:स्थान (6, 8, 12) में हो तो व्यक्ति दरिद्र होता है।
- लाभ भाव का स्वामी भी दु:स्थान (6, 8,12) में हो और धन भाव में किसी अशुभ ग्रह की युति हो तथा धन और लाभ भाव दोनों अस्त हो या अशुभ भावेशों के साथ हो तो जातक जन्म से ही दरिद्र होता है और जातक को अपने भोजन के लिए भी भीख मांगनी पड़ती है।
- धन और लाभ भाव के स्वामी अरि, रंध्र, या व्यय भाव (6, 8, 12) में स्थित हो तथा मंगल लाभ भाव में और राहु धन भाव में स्थित हो तो जातक राजदंड के कारण अपनी संपत्ति खो देता है।
- जब बृहस्पति लाभ भाव में हो, शुक्र धन भाव में हो और शुभ ग्रह व्यय भाव में हो तथा धनेश की शुभ ग्रह के साथ युति हो तो धार्मिक कार्यों पर धन व्यय होता है तथा व्यक्ति धर्मार्थ धन दान करता है।
- यदि धन भाव का स्वामी स्वराशि में हो या उच्च राशि में हो तो जातक लोगों की मदद करता है तथा प्रसिद्ध भी होता है।
- यदि धनेश की शुभ ग्रह के साथ युति हो और वह अच्छे वर्ग में हो तो जातक के परिवार में अनायास ही सभी प्रकार की संपत्ति प्राप्त होती है। (धनेश पारावतांश में हो या दश वर्ग में देवलोक, ब्रह्मलोक, शक्रवाहन, या श्रीधाम अंश में हो)
- यदि धन भाव का स्वामी बल से संपन्न हो तो जातक सुंदर आंखों वाला होता है। कहा गया है कि ग्रह अरि, रंध्र या व्यय भाव (6, 8, 12) में हो तो आंखों में रोग या विकृति होती है।
- यदि धन भाव और उसका स्वामी पाप ग्रहों के साथ युति में हो तो जातक असत्य बोलने वाला तथा वायु रोग से पीड़ित होता है।
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