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धन त्रिकोण | Dhan Tribhuj | Money Triangle | हस्तरेखा |


@धन त्रिकोण | Money Triangle | हस्तरेखा |
हथेली में मस्तिष्क रेखा व भाग्य रेखा के साथ कोई एक रेखा आकर मिले अर्थात् बुध रेखा के मिलने से जो एक बड़ा त्रिभुज बनता है, वह धनदायक होता है। इसको धन त्रिकोण कहते हैं। जिनकी हथेलियों में इस प्रकार का त्रिभुज बनता है वे व्यक्ति धनी होते हैं। ऐसे व्यक्तियों के पास जमा पूंजी अधिक होती है। ऐसे व्यक्तियों के पास स्थाई संपत्ति, मकान, भूमि, वाहन आदि पर्याप्त मात्रा में होते हैं। इस प्रकार के त्रिभुज वाले व्यक्ति अच्छे व्यापारी होते हैं। ऐसे व्यक्ति आजीवन संपन्नता में ही जीवन व्यतीत करते हैं।

यदि मस्तिष्क रेखा सीधी हो और भाग्य रेखा मस्तिष्क रेखा तक जा कर रुक जाए तो व्यक्ति 35 वर्ष तक धन संपत्ति का उपभोग करेगा और यदि मस्तिष्क रेखा ऊपर उठी हुई हो तो व्यक्ति 42 वर्ष तक उपभोग करेगा। यदि भाग्य रेखा लंबी हो और मध्यमा अंगुली के पास दो खड़ी रेखाएं हो तो व्यक्ति आजीवन संपत्ति का उपभोग करेगा।

यदि यह त्रिभुज मस्तिष्क, रेखा बुध रेखा और जीवन रेखा से बन रहा हो तो यह बड़ा त्रिभुज हो जाएगा। यह व्यक्ति को अपने परिश्रम के आधार पर धन देगा। यदि भाग्य रेखा मस्तिष्क रेखा पर आकर रुक जाए तो व्यक्ति के जीवन में अकस्मात् अवनति देखने को मिलती है। उसका धन किसी न किसी प्रकार से नष्ट हो जाता है। यदि भाग्य रेखा इस त्रिभुज के अंदर से जाकर इसको दो भागों में बांट दे तो धन तो खूब आता है परंतु खर्चे बहुत होते हैं बचत नहीं हो पाती है। इस त्रिभुज का कोई कोना यदि खुला हो तो व्यक्ति का आय व्यय का कोई हिसाब नहीं होगा। उसके खर्चे और आय में अनियमितता होगी। यदि वह खर्च कम करेगा तो उसकी आय भी कम हो जाएगी। इस त्रिभुज के स्थान पर राहु क्षेत्र होता है। यदि राहु क्षेत्र अंदर धंसा हुआ होता है तो व्यक्ति अपने परिश्रम से कमाई भी करता है और खर्च भी करता है। यदि यह क्षेत्र समतल हो तो व्यक्ति स्वयं के परिश्रम से कमाई नहीं करता है तथा दूसरों के धन पर आश्रित रहता है या कर्ज लेता रहता है।

यदि यह भाग्य रेखा मणिबंध से नहीं निकलकर चंद्र पर्वत से निकलकर ट्रायंगल बनाती है तो व्यक्ति नौकरी से या यात्राओं के माध्यम से धन प्राप्त करता है। वह व्यक्ति विदेश जा सकता है या देश में ही दूर-दराज के क्षेत्र में रह सकता है। व्यक्ति इस प्रकार का कार्य करेगा जिसमें निरंतर घूमना फिरना लगा रहेगा।

यदि इस त्रिभुज की कोई भुजा टूटी फूटी हो या त्रिभुज के अंदर आडी-टेढ़ी रेखाएं जा रही हो तो व्यक्ति को धन की हानि होती है। जीवन में कई बार धन की हानि होती है और ऐसे व्यक्ति बचत नहीं कर पाते हैं। मध्यायु में आर्थिक स्थिति में खूब उतार चढ़ाव रहता है।
इस प्रकार से यदि हथेली में धन त्रिकोण बन रहा हो तो जीवन में 28 या 32 वें वर्ष में ही प्रगति के खूब अवसर प्राप्त हो जाते हैं और व्यक्ति उन अवसरों के अनुसार परिश्रम व व्यापार कर करोड़पति व अरबपति बन सकता है।

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Activation of Planets in Astrology | ज्योतिष में ग्रहों की सक्रियता | Part-3

मेष लग्न
मेष लग्न की कुंडली के लिए लग्नेश और अष्टमेश मंगल शुभ होता है। पंचम भाव के स्वामी सूर्य भी शुभ होते हैं और देव गुरु बृहस्पति नवें और द्वादश भाव के स्वामी होकर भी योगकारक कहे जाते हैं।
मेष लग्न के लिए बुध शुक्र शनि अकारक ग्रह होते हैं।

वृष लग्न
वृष लग्न की कुंडली में लग्नेश और छठे भाव के स्वामी शुक्र शुभ ग्रह होते हैं। शुक्र की मूल त्रिकोण राशि षष्ट भाव में है। अतः षष्ट में स्थित शुक्र अशुभ फल देगा। पंचम और दूसरे भाव के स्वामी बुध भी शुभ ग्रह कहे जाते हैं और वृषभ लग्न की कुंडली में शनि देव नौवें और दसवें भाव के स्वामी होकर के परम राजयोग कारक कहे जाते हैं।
वृष लग्न के जातकों के लिए चंद्र मंगल बृहस्पति अकारक ग्रह होते हैं।

मिथुन लग्न
मिथुन लग्न की कुंडली में लग्नेश और चौथे भाव के स्वामी बुध शुभ ग्रह होते हैं। पंचम और द्वादश भाव के स्वामी शुक्र भी शुभ ग्रह माने जाते हैं।
मिथुन लग्न के जातकों के लिए सूर्य मंगल शनि अकारक ग्रह होते हैं।

कर्क लग्न
कर्क लग्न की कुंडली में लग्नेश चंद्रमा शुभ कारक होता है। पंचम और दशम भाव के स्वामी मंगल परम राजयोग कारक होते हैं और नवे भाव के स्वामी बृहस्पति भी कर्क लग्न के जातकों के लिए शुभ रहते हैं। मूल त्रिकोण राशि षष्ट भाव में है। अतः षष्ट भाव में स्थित बृहस्पति अशुभ होता है।
कर्क लग्न के जातकों के लिए बुध शुक्र शनि अकारक ग्रह होते हैं।

सिंह लग्न
सिंह लग्न की बात करें तो इस लग्न के जातकों के लिए सूर्य लग्नेश होकर शुभ होते हैं। मंगल नवमेश और चतुर्थेश होकर के भी कुंडली में राजयोग कारक हो जाते हैं।
सिंह लग्न के जातकों के लिए बुध शुक्र शनि अकारक ग्रह होते हैं।

कन्या लग्न
कन्या लग्न की कुंडली में लग्नेश और दशमेश बुध शुभ होते हैं।
कन्या लग्न के जातकों के लिए मंगल, चंद्र व शनि अकारक ग्रह होते हैं।

तुला लग्न
तुला लग्न के जातकों के लिए शुक्र लग्न का स्वामी होकर शुभ फल देता है। इसके अलावा शनि केंद्र और त्रिकोण के स्वामी होने के कारण राजयोग कारक हो जाते है।
तुला लग्न के जातकों के लिए मंगल, बृहस्पति, बुध और सूर्य अकारक ग्रह होते हैं।

वृश्चिक लग्न
वृश्चिक लग्न की कुंडली के लिए लग्नेश मंगल छठे भाव के स्वामी भी होते हैं लेकिन लग्नेश होने के कारण वह शुभ फल देने वाले कहें जाते हैं। मूल त्रिकोण राशि षष्ट भाव में है। अतः षष्ट भाव में स्थित मंगल अशुभ फल देता है। वृश्चिक लग्न के जातकों के लिए पांचवें भाव और दूसरे भाव के स्वामी बृहस्पति भी शुभ ग्रह होते हैं। इसके अलावा नवम भाव के स्वामी चंद्रमा परम राजयोग कारक ग्रह होते हैं।
वृश्चिक लग्न के जातकों के लिए बुध शनि व शुक्र अकारक ग्रह होते हैं।

धनु लग्न
धनु लग्न की कुंडली के लिए लग्नेश और चतुर्थ भाव के स्वामी बृहस्पति शुभ होते हैं। पांचवें और बारहवें भाव का स्वामी मंगल राजयोग कारक होता है और नवम भाव का स्वामी सूर्य बेहद शुभ परिणाम देने वाला होता है।
धनु लग्न के जातकों के लिए शुक्र व शनि अकारक ग्रह हो जाते हैं।

मकर लग्न
मकर लग्न की कुंडली में लग्न का स्वामी शनि राजयोग कारक होता है। पंचमेश और दशमेश शुक्र भी बेहद शुभ परिणाम देने वाला होता है क्योंकि एक त्रिकोण और केंद्र का स्वामी होने पर ग्रह अतीव हो जाता है। मकर लग्न के जातकों के लिए नवे भाव के स्वामी बुध भी अच्छे फल देने वाले कहे गए हैं।
मकर लग्न के जातकों के लिए मंगल और बृहस्पति अकारक ग्रह होते हैं।

कुंभ लग्न
कुंभ लग्न के जातकों के लिए लग्नेश शनि बारहवें भाव के भी स्वामी होते हैं लेकिन लग्नेश होने के कारण शुभ ग्रह है। इसके अलावा चतुर्थेश और नवमेश शुक्र को भी अच्छा ग्रह माना जाता है। शुक्र कुंभ लग्न के जातकों को सभी भौतिक सुख सुविधाएं प्रदान करता है।
कुंभ लग्न के जातकों के लिए चंद्र मंगल गुरु अकारक ग्रह हो जाते हैं।

मीन लग्न
मीन लग्न के जातकों के लिए लग्नेश और दशमेश बृहस्पति शुभ होते हैं। पांचवें भाव के स्वामी चंद्रमा त्रिकोण के स्वामी होकर राजयोग कारक होते हैं। इसके अलावा मंगल भाग्य स्थान का स्वामी होता है इसीलिए मीन लग्न के जातकों को मंगल भी शुभ फल प्रदान करता है।
मीन लग्न के जातकों के लिए सूर्य शुक्र शनि अकारक ग्रह हो जाते हैं।

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Activation of Planets in Astrology | ज्योतिष में ग्रहों की सक्रियता | Part-2

https://www.youtube.com/watch?v=3XMOHf7OB2Q&t=17s

मेष लग्न
मेष लग्न की कुंडली के लिए लग्नेश और अष्टमेश मंगल शुभ होता है। पंचम भाव के स्वामी सूर्य भी शुभ होते हैं और देव गुरु बृहस्पति नवें और द्वादश भाव के स्वामी होकर भी योगकारक कहे जाते हैं।
मेष लग्न के लिए बुध शुक्र शनि अकारक ग्रह होते हैं।

वृष लग्न
वृष लग्न की कुंडली में लग्नेश और छठे भाव के स्वामी शुक्र शुभ ग्रह होते हैं। शुक्र की मूल त्रिकोण राशि षष्ट भाव में है। अतः षष्ट में स्थित शुक्र अशुभ फल देगा। पंचम और दूसरे भाव के स्वामी बुध भी शुभ ग्रह कहे जाते हैं और वृषभ लग्न की कुंडली में शनि देव नौवें और दसवें भाव के स्वामी होकर के परम राजयोग कारक कहे जाते हैं।
वृष लग्न के जातकों के लिए चंद्र मंगल बृहस्पति अकारक ग्रह होते हैं।

मिथुन लग्न
मिथुन लग्न की कुंडली में लग्नेश और चौथे भाव के स्वामी बुध शुभ ग्रह होते हैं। पंचम और द्वादश भाव के स्वामी शुक्र भी शुभ ग्रह माने जाते हैं।
मिथुन लग्न के जातकों के लिए सूर्य मंगल शनि अकारक ग्रह होते हैं।

कर्क लग्न
कर्क लग्न की कुंडली में लग्नेश चंद्रमा शुभ कारक होता है। पंचम और दशम भाव के स्वामी मंगल परम राजयोग कारक होते हैं और नवे भाव के स्वामी बृहस्पति भी कर्क लग्न के जातकों के लिए शुभ रहते हैं। मूल त्रिकोण राशि षष्ट भाव में है। अतः षष्ट भाव में स्थित बृहस्पति अशुभ होता है।
कर्क लग्न के जातकों के लिए बुध शुक्र शनि अकारक ग्रह होते हैं।

सिंह लग्न
सिंह लग्न की बात करें तो इस लग्न के जातकों के लिए सूर्य लग्नेश होकर शुभ होते हैं। मंगल नवमेश और चतुर्थेश होकर के भी कुंडली में राजयोग कारक हो जाते हैं।
सिंह लग्न के जातकों के लिए बुध शुक्र शनि अकारक ग्रह होते हैं।

कन्या लग्न
कन्या लग्न की कुंडली में लग्नेश और दशमेश बुध शुभ होते हैं।
कन्या लग्न के जातकों के लिए मंगल, चंद्र व शनि अकारक ग्रह होते हैं।

तुला लग्न
तुला लग्न के जातकों के लिए शुक्र लग्न का स्वामी होकर शुभ फल देता है। इसके अलावा शनि केंद्र और त्रिकोण के स्वामी होने के कारण राजयोग कारक हो जाते है।
तुला लग्न के जातकों के लिए मंगल, बृहस्पति, बुध और सूर्य अकारक ग्रह होते हैं।

वृश्चिक लग्न
वृश्चिक लग्न की कुंडली के लिए लग्नेश मंगल छठे भाव के स्वामी भी होते हैं लेकिन लग्नेश होने के कारण वह शुभ फल देने वाले कहें जाते हैं। मूल त्रिकोण राशि षष्ट भाव में है। अतः षष्ट भाव में स्थित मंगल अशुभ फल देता है। वृश्चिक लग्न के जातकों के लिए पांचवें भाव और दूसरे भाव के स्वामी बृहस्पति भी शुभ ग्रह होते हैं। इसके अलावा नवम भाव के स्वामी चंद्रमा परम राजयोग कारक ग्रह होते हैं।
वृश्चिक लग्न के जातकों के लिए बुध शनि व शुक्र अकारक ग्रह होते हैं।

धनु लग्न
धनु लग्न की कुंडली के लिए लग्नेश और चतुर्थ भाव के स्वामी बृहस्पति शुभ होते हैं। पांचवें और बारहवें भाव का स्वामी मंगल राजयोग कारक होता है और नवम भाव का स्वामी सूर्य बेहद शुभ परिणाम देने वाला होता है।
धनु लग्न के जातकों के लिए शुक्र व शनि अकारक ग्रह हो जाते हैं।

मकर लग्न
मकर लग्न की कुंडली में लग्न का स्वामी शनि राजयोग कारक होता है। पंचमेश और दशमेश शुक्र भी बेहद शुभ परिणाम देने वाला होता है क्योंकि एक त्रिकोण और केंद्र का स्वामी होने पर ग्रह अतीव हो जाता है। मकर लग्न के जातकों के लिए नवे भाव के स्वामी बुध भी अच्छे फल देने वाले कहे गए हैं।
मकर लग्न के जातकों के लिए मंगल और बृहस्पति अकारक ग्रह होते हैं।

कुंभ लग्न
कुंभ लग्न के जातकों के लिए लग्नेश शनि बारहवें भाव के भी स्वामी होते हैं लेकिन लग्नेश होने के कारण शुभ ग्रह है। इसके अलावा चतुर्थेश और नवमेश शुक्र को भी अच्छा ग्रह माना जाता है। शुक्र कुंभ लग्न के जातकों को सभी भौतिक सुख सुविधाएं प्रदान करता है।
कुंभ लग्न के जातकों के लिए चंद्र मंगल गुरु अकारक ग्रह हो जाते हैं।

मीन लग्न
मीन लग्न के जातकों के लिए लग्नेश और दशमेश बृहस्पति शुभ होते हैं। पांचवें भाव के स्वामी चंद्रमा त्रिकोण के स्वामी होकर राजयोग कारक होते हैं। इसके अलावा मंगल भाग्य स्थान का स्वामी होता है इसीलिए मीन लग्न के जातकों को मंगल भी शुभ फल प्रदान करता है।
मीन लग्न के जातकों के लिए सूर्य शुक्र शनि अकारक ग्रह हो जाते हैं।

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Activation of Planets in Astrology | ज्योतिष में ग्रहों की सक्रियता | Part-1

https://www.youtube.com/watch?v=HJsdj0EBalI&t=74s

मेष लग्न
मेष लग्न की कुंडली के लिए लग्नेश और अष्टमेश मंगल शुभ होता है। पंचम भाव के स्वामी सूर्य भी शुभ होते हैं और देव गुरु बृहस्पति नवें और द्वादश भाव के स्वामी होकर भी योगकारक कहे जाते हैं।
मेष लग्न के लिए बुध शुक्र शनि अकारक ग्रह होते हैं।

वृष लग्न
वृष लग्न की कुंडली में लग्नेश और छठे भाव के स्वामी शुक्र शुभ ग्रह होते हैं। शुक्र की मूल त्रिकोण राशि षष्ट भाव में है। अतः षष्ट में स्थित शुक्र अशुभ फल देगा। पंचम और दूसरे भाव के स्वामी बुध भी शुभ ग्रह कहे जाते हैं और वृषभ लग्न की कुंडली में शनि देव नौवें और दसवें भाव के स्वामी होकर के परम राजयोग कारक कहे जाते हैं।
वृष लग्न के जातकों के लिए चंद्र मंगल बृहस्पति अकारक ग्रह होते हैं।

मिथुन लग्न
मिथुन लग्न की कुंडली में लग्नेश और चौथे भाव के स्वामी बुध शुभ ग्रह होते हैं। पंचम और द्वादश भाव के स्वामी शुक्र भी शुभ ग्रह माने जाते हैं।
मिथुन लग्न के जातकों के लिए सूर्य मंगल शनि अकारक ग्रह होते हैं।

कर्क लग्न
कर्क लग्न की कुंडली में लग्नेश चंद्रमा शुभ कारक होता है। पंचम और दशम भाव के स्वामी मंगल परम राजयोग कारक होते हैं और नवे भाव के स्वामी बृहस्पति भी कर्क लग्न के जातकों के लिए शुभ रहते हैं। मूल त्रिकोण राशि षष्ट भाव में है। अतः षष्ट भाव में स्थित बृहस्पति अशुभ होता है।
कर्क लग्न के जातकों के लिए बुध शुक्र शनि अकारक ग्रह होते हैं।

सिंह लग्न
सिंह लग्न की बात करें तो इस लग्न के जातकों के लिए सूर्य लग्नेश होकर शुभ होते हैं। मंगल नवमेश और चतुर्थेश होकर के भी कुंडली में राजयोग कारक हो जाते हैं।
सिंह लग्न के जातकों के लिए बुध शुक्र शनि अकारक ग्रह होते हैं।

कन्या लग्न
कन्या लग्न की कुंडली में लग्नेश और दशमेश बुध शुभ होते हैं।
कन्या लग्न के जातकों के लिए मंगल, चंद्र व शनि अकारक ग्रह होते हैं।

तुला लग्न
तुला लग्न के जातकों के लिए शुक्र लग्न का स्वामी होकर शुभ फल देता है। इसके अलावा शनि केंद्र और त्रिकोण के स्वामी होने के कारण राजयोग कारक हो जाते है।
तुला लग्न के जातकों के लिए मंगल, बृहस्पति, बुध और सूर्य अकारक ग्रह होते हैं।

वृश्चिक लग्न
वृश्चिक लग्न की कुंडली के लिए लग्नेश मंगल छठे भाव के स्वामी भी होते हैं लेकिन लग्नेश होने के कारण वह शुभ फल देने वाले कहें जाते हैं। मूल त्रिकोण राशि षष्ट भाव में है। अतः षष्ट भाव में स्थित मंगल अशुभ फल देता है। वृश्चिक लग्न के जातकों के लिए पांचवें भाव और दूसरे भाव के स्वामी बृहस्पति भी शुभ ग्रह होते हैं। इसके अलावा नवम भाव के स्वामी चंद्रमा परम राजयोग कारक ग्रह होते हैं।
वृश्चिक लग्न के जातकों के लिए बुध शनि व शुक्र अकारक ग्रह होते हैं।

धनु लग्न
धनु लग्न की कुंडली के लिए लग्नेश और चतुर्थ भाव के स्वामी बृहस्पति शुभ होते हैं। पांचवें और बारहवें भाव का स्वामी मंगल राजयोग कारक होता है और नवम भाव का स्वामी सूर्य बेहद शुभ परिणाम देने वाला होता है।
धनु लग्न के जातकों के लिए शुक्र व शनि अकारक ग्रह हो जाते हैं।

मकर लग्न
मकर लग्न की कुंडली में लग्न का स्वामी शनि राजयोग कारक होता है। पंचमेश और दशमेश शुक्र भी बेहद शुभ परिणाम देने वाला होता है क्योंकि एक त्रिकोण और केंद्र का स्वामी होने पर ग्रह अतीव हो जाता है। मकर लग्न के जातकों के लिए नवे भाव के स्वामी बुध भी अच्छे फल देने वाले कहे गए हैं।
मकर लग्न के जातकों के लिए मंगल और बृहस्पति अकारक ग्रह होते हैं।

कुंभ लग्न
कुंभ लग्न के जातकों के लिए लग्नेश शनि बारहवें भाव के भी स्वामी होते हैं लेकिन लग्नेश होने के कारण शुभ ग्रह है। इसके अलावा चतुर्थेश और नवमेश शुक्र को भी अच्छा ग्रह माना जाता है। शुक्र कुंभ लग्न के जातकों को सभी भौतिक सुख सुविधाएं प्रदान करता है।
कुंभ लग्न के जातकों के लिए चंद्र मंगल गुरु अकारक ग्रह हो जाते हैं।

मीन लग्न
मीन लग्न के जातकों के लिए लग्नेश और दशमेश बृहस्पति शुभ होते हैं। पांचवें भाव के स्वामी चंद्रमा त्रिकोण के स्वामी होकर राजयोग कारक होते हैं। इसके अलावा मंगल भाग्य स्थान का स्वामी होता है इसीलिए मीन लग्न के जातकों को मंगल भी शुभ फल प्रदान करता है।
मीन लग्न के जातकों के लिए सूर्य शुक्र शनि अकारक ग्रह हो जाते हैं।

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signs on jupiter mount in palmistry

https://www.youtube.com/watch?v=dv44rLp2Ze8

हथेली में विभिन्न स्थान पर विभिन्न प्रकार के चिह्न भी पाए जाते हैं। प्राय क्रॉस, बिंदु, वर्ग, जाल, नक्षत्र अर्थात् तारा, वृत्त, त्रिभुज, द्वीप आदि चिह्न विभिन्न पर्वतों और रेखाओं पर पाए जाते हैं। हथेली में विभिन्न लक्षणों के साथ-साथ इन चिह्न का अध्ययन करना चाहिए। केवल चिह्न के आधार पर कोई निर्णय नहीं करना चाहिए। आज हम बृहस्पति पर्वत पर बनने वाले विभिन्न चिह्नों के बारे में चर्चा कर रहे हैं। अंगूठे के पास वाली तर्जनी अंगुली अर्थात् इंडेक्स फिंगर के निचले हिस्से पर बृहस्पति पर्वत स्थित होता है। बृहस्पति ज्ञान, परोपकार, धर्म, न्याय, सफलता, धन आदि का ग्रह माना गया है। गुरु पर्वत पर स्थित चिह्न क्या-क्या प्रभाव लाते हैं? आईए जानते हैं।

* एक अच्छा बृहस्पति पर्वत उभरा हुआ होता है। बृहस्पति पर्वत व्यक्ति को ज्ञानी, संवेदनशील और विनम्र बनता है। ऐसे लोग परोपकारी होते हैं। अधिक मात्रा में उभरा हुआ बृहस्पति पर्वत व्यक्ति को अहंकारी बना देता है।

* यदि बृहस्पति पर्वत पर गड्ढे का चिह्न दिखाई दे तो व्यक्ति को भाग्य का फल पर्याप्त रूप से नहीं मिल पाता है। ऐसे लोग नौकरी करने वाले होते हैं। ऐसे लोग दूसरों के अधीन कार्य करते हैं।

* गुरु पर्वत सामान्य उभरा हुआ होना चाहिए। अधिक उभरा हुआ होने से व्यक्ति में अहंकार की भावना उत्पन्न होती है और व्यक्ति आत्ममुग्ध होता है। वह दूसरों को महत्व नहीं देता है। वह अपने आप को श्रेष्ठ समझता है।

* गुरु पर्वत से नेतृत्व क्षमता भी देखी जाती है। यदि गुरु पर्वत पर कोई धब्बा या जाली का चिह्न हो तो व्यक्ति में नेतृत्व क्षमता कम हो जाती है। वह घमंडी और स्वार्थी हो जाता है।

गुरु पर्वत पर रेखाओं का जाल हो या गुरु पर्वत पर आड़ी रेखाएं हो तो इसको अशुभ माना गया है। इस प्रकार का चिह्न होने से गुरु पर्वत की शुभता में कमी आती है।

* गुरु पर्वत प्रबंधन के लिए भी जाना जाता है। यदि गुरु पर्वत पर खड़ी रेखाएं होती है तो यह शुभ फल देता है। ऐसा व्यक्ति श्रेष्ठ प्रबंधक हो सकता है।

* गुरु पर्वत से सफलता देखी जाती है और अधिकार प्राति भी देखी जाती है। गुरु पर्वत पर नक्षत्र या तारे का चिह्न हो तो व्यक्ति को सम्माननीय पद प्राप्त होता है। व्यक्ति जीवन में पद व प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। उसको अकस्मात धन की प्राप्ति होती है।

* गुरु पर्वत पर त्रिशूल या त्रिकोण का चिह्न हो तो व्यक्ति उच्च अधिकारी बनता है। यह चिह्न व्यक्ति को धनी व संपत्तिशाली बनाता है। व्यक्ति को राजनीतिज्ञ व उद्योगपति बनाता है।

* गुरु पर्वत पर यदि वृत्त का चिह्न हो तो वह व्यक्ति प्रभावशाली होता है। उसके विवाह में दहेज की प्राप्ति होती है। वह उच्च पद प्राप्त करता है।

* सामान्यतः क्रॉस का चिह्न हथेली में कोई विशेष प्रभाव नहीं देता है, फिर भी गुरु पर्वत पर क्रॉस का चिन्ह शुभ ही माना गया है‌। जिन व्यक्तियों के गुरु पर्वत पर क्रॉस का चिह्न हो वह परोपकारी तथा धार्मिक होते हैं। ऐसे व्यक्ति मिलनसार होते हैं और ओजस्वी होते हैं। व्यक्ति सफल वैवाहिक जीवन प्राप्त करता है। क्रॉस का चिह्न निर्दोष होना चाहिए। अर्थात् इस चिह्न को कोई रेखा काटे तो शुभ प्रभाव कम हो जाते हैं और व्यक्ति निराश होता है।

* गुरु पर्वत पर यदि द्वीप का चिह्न हो तो व्यक्ति की इच्छाओं की पूर्ति नहीं होती है।

व्यक्ति का आत्मविश्वास निर्बल होता है।

* गुरु पर्वत पर यदि वर्ग का चिह्न हो तो व्यक्ति को मानहानि से बचाता है।

* गुरु पर्वत पर बिंदु का चिह्न हो तो व्यक्ति की प्रतिष्ठा में हानि होती है और विवाह में अड़चनें आती है।

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ram mandir ayodhya | ayodhya ram temple | यात्रा से पूर्व ये करें तो विघ्न दूर होंगे |

 

https://www.youtube.com/watch?v=vbclYxO7fDI&t=5s

ram mandir ayodhya | ayodhya ram temple | यात्रा से पूर्व ये करें तो विघ्न दूर होंगे |

If you do this before traveling to ayodhya ram temple, all obstacles will be removed.

भगवान श्री राम का नाम स्वयं में एक महामंत्र है। राम नाम की महिमा अपरंपार है। राम नाम का मंत्र सर्व रूप मे ग्रहण किया जाता है। इस के जप से ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति सहज हो जाती है। अन्य नामों की तुलना में राम नाम हजार नामों के समान है। राम मंत्र को तारक मंत्र भी कहा जाता है। इस मंत्र के जपने से सभी दुःखों का अंत होता है।

राम मणिपुर अर्थात् नाभि चक्र का बीज मंत्र है। यह निज शक्ति का स्रोत है। यह ऊर्जा से कंपन होकर नाभिचक्र को सक्रिय करता है।

मणिपुर चक्र सात प्रमुख चक्रों में से तीसरा है और यह आत्मविश्वास बढ़ाता है, चिंता को कम करता है और नकारात्मक आवेगों को नियंत्रित करता है। मणिपुर परिवर्तनकारी शक्ति और आंतरिक शक्ति से जुड़ा है, ये दोनों तब प्रकट होते हैं जब योगी राम का जप करता है।

 

अयोध्या में श्री रामलला शुभ मुहूर्त में विराजमान होंगे। श्री रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा 22 जनवरी 2024 पौष मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि सोमवार को अभिजित मुहूर्त, एन्द्र योग, मृगशिरा नक्षत्र, मेष लग्न और वृश्चिक नवांश में होगी जो दिन के 12 बजकर 29 मिनट 08 सेकंड से 12 बजकर 30 मिनट 32 सेकंड तक अर्थात 84 सेकंड का होगा। इसी समय में प्रभु श्रीराम की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी।

देश के कोने कोने से लोग अयोध्या जाएंगे। अतः अपनी सुविधानुसार यात्रा मुहूर्त नहीं ले पाएंगे। यदि आप अयोध्या जा रहे हैं तो आपकी यात्रा शुभ हो और आपको प्रभु श्री राम के दर्शन हो व आप पर प्रभु की कृपा प्राप्ति हो तो इस उद्देश्य से यात्रा से पूर्व भगवान श्री राम के चित्र के समक्ष पूर्वाभिमुख बैठकर इस प्रकार से बाल स्वरूप का ध्यान करें:-

श्री अवधेसके द्वारें सकारें गई सुत गोद कै, भूपति लै निकसे।

अवलोकि हौं सोच बिमोचनको ठगि-सी रही, जे न ठगे धिक-से।।

तुलसी मन-रंजन रंजित-अंजन नैन सुखंजन-जातक-से।।

सजनी ससिमें समसील उभै नवनील सरोरूह -से बिकसे।1।

 

 

 

पग नूपुर औ पहुँची करकंजनि मंजु बनी मनिमाल हिएँ।

नवनीत कलेवर पीत झँगा झलकै पुलकैं नृपु गोद लिएँ।

अरबिंदु से आननु रूप मरंदु अनंदित लोचन -भृंग पिएँ।

मनमो न बस्यौ अस बालकु जौं तुलसी जगमें फलु कौन जिएँ।2।

 

 

 

तनकी दुति स्याम सरोरूह लोचन कंजकी मंजुलताई हरैं।

अति सुंदर सोहत धूरि भरे छबि भूरि अनंगकी दुरि धरैं।

दमकैं दँतियाँ दुति दामिनि-ज्यों किलकैं कल बाल-बिनोद करैं।

अवधेस के बालक चारि सदा तुलसी-मन -मंदिर में बिहरैं।3।

 

 

 

 

बर दंतकी पंगति कुंदकली अधराधर-पल्लव खेलनकी।

चपला चमकैं घन बीच जगैं छबि मोतिन माल अमोलनकी।।

घुँघरारि लटैं लटकैं मुख ऊपर कुंडल लोल कपोलनकी।

नेवछावरि प्रान करैं तुलसी बलि जाउँ लला इन बोलनकी।4।

 

 

 

पदकंजनि मंजु बनीं पनहीं धनुहीं सर पंकज-पानि लिएँ।

लरिका सँग खेलत डोलत हैं सरजू-तट चौहट हाट हिएँ।

तुलसी अस बालक सों नहिं नेहु कहा जप जाग समाधि किएँ।

नर वे खर सूकर स्वान समान कहै जगमें फलु कौन जिएँ।5।

 

इसके अलावा आप राम रक्षा स्तोत्र भी पढ़ सकते हैं।

इसके पश्चात् 108 बार अर्थात् एक माला इस मंत्र की जपें:-

राम क्लीम्।

इस राम मंत्र का प्रयोग अनिष्ट शक्तियों से रक्षा के लिए किया जाता है। ये शक्तियां नकारात्मक मानसिकता, अदृश्य शक्तियां आदि हो सकती हैं।

इसके पश्चात् यह मंत्र बोलते हुए रवाना हो जाए:-

प्रविसि नगर कीजे सब काजा। हृदय राखि कौशलपुर राजा।

जब आप रेलगाड़ी आदि में बैठे हों तो यात्रा के दौरान अपने मन में इस मंत्र का स्मरण करते रहें:-

‘श्री राम जय राम जय जय राम’

यह सात शब्दों वाला तारक मंत्र है। इसकी शक्ति अद्भुत है।

इस प्रकार से राम जन्मभूमि की यात्रा करने से आपके सभी विघ्न दूर होंगे और आप पर प्रभु श्री राम की पूर्ण कृपा होगी।

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सिद्ध कुंजिका स्तोत्र

https://www.youtube.com/watch?v=JtD1_eAgU3w&t=46s

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र अत्यंत ही शक्तिशाली है इसमें अनेक बीजमंत्रों का

समावेश है। इस स्तोत्र के पठन से शत्रुबाधा से मुक्ति प्राप्त होती है। रुद्रयामल के गोरी तंत्र के अंतर्गत इसका वर्णन आया है। भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को बताया गया यह स्तोत्र नवार्ण मंत्र “ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे” पर आधारित है। इस स्तोत्र का पाठ करने से दुर्गा सप्तशती के पाठ करने के बराबर फल प्राप्त होता है।

इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति सुरक्षित होता है और उसकी समस्त बाधाएं दूर होती है। व्यक्ति का आत्मबल बढ़ता है और उसका आध्यात्मिक विकास होता है। इसका पाठ करने से व्यक्ति की सांसारिक इच्छाएं भी पूर्ण होती है। इसके पठन से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं तथा आत्मिक मानसिक और शारीरिक शुद्धि होती है।

दुर्गा सप्तशती के पाठ से पूर्व सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। इसका स्वतंत्र रूप से भी पाठ होता है। यह सिद्ध स्तोत्र है।

इस स्तोत्र का पाठ नवरात्रि व गुप्त नवरात्रि में करना चाहिए। इसके अलावा इसका नियमित पाठ भी किया जा सकता है। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में व सायं काल भी इसका पाठ किया जा सकता है। सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पाठ के साथ किसी पूजा की आवश्यकता नहीं होती है। इस स्त्रोत के पाठ मात्र से सिद्धि प्राप्त होती हैं। कवच, अर्गला, कीलक, रहस्य, सूक्त, ध्यान, न्यास और अर्चन आवश्यक नहीं है। केवल कुंजिका स्तोत्र के पाठ से दुर्गा पाठ का फल प्राप्त होता है।

इसका पाठ करने से मारण, मोहन, वशीकरण, स्तंभन, उच्चाटन आदि सिद्ध होते हैं।

स्नान आदि करने के पश्चात पूर्वाभिमुख आसन पर बैठकर धूप दीप प्रज्वलित कर ले। इस स्तोत्र के 9, 27 या 108 पाठ नित्य करें।

देवी दुर्गा को प्रणाम करके पाठ आरंभ करें और पाठ के पश्चात भी प्रणाम करें।

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र इस प्रकार है:-

 

॥सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम्॥

शिव उवाच

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्।

येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत् ॥१॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।

न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥२॥

कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।

अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥३॥

गोपनीयं प्रयत्‍‌नेन स्वयोनिरिव पार्वति।

मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।

पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्॥४॥

॥अथ मन्त्रः॥

ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥

ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल

ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा॥

॥इति मन्त्रः॥

नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।

नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि॥१॥

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि।

जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे॥२॥

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका।

क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥३॥

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी।

विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥४॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्‍‌नी वां वीं वूं वागधीश्‍वरी।

क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥५॥

हुं हुं हुँ हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।

भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥६॥

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं।

धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥७॥

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा।

सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥८॥

इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे।

अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥

यस्तु कुञ्जिकाया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्।

न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥

इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम्।

 

 

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medical astrology & Ayurveda basics

https://www.youtube.com/watch?v=z8hMsm4kyXM&t=326s

medical astrology basics
• ग्रह और शरीर के अंग
आइए विश्लेषण करें कि ग्रह किस प्रकार जुड़े हुए हैं
सूक्ष्म ब्रह्मांड.
1. सूर्य और चंद्रमा दोनों का आंखों पर अधिपत्य होता है।
2. बुध और शुक्र नासिका पर आधिपत्य रखते हैं।
3. शनि और मंगल कानों पर अधिपत्य करते हैं।
4. बृहस्पति वाणी पर अधिपत्य करता है।
6. राहु और केतु उत्सर्जन अंगों पर अधिपत्य करते हैं।
इस प्रकार, हम पाते हैं कि शरीर के विभिन्न अंगों का विभिन्न ग्रह प्रतिनिधित्व करते हैँ।
ज्योतिष के अध्ययन में सूक्ष्म शक्तियों पर नियंत्रण का ग्रहों के संबंध में विश्लेषण निहित है।
शरीर में असमानताओं का पता लगाने के लिए हमें ग्रहों के प्रभाव से उत्पन्न असंतुलन, ग्रह और उनकी क्रिया और अंतर्क्रिया के परिणाम के अर्थ (कारकत्व) को जानना होगा।
हमारे प्राचीन ऋषि जैसे व्यास, वशिष्ठ, पराशर, कश्यप, नारद, गर्ग, मरीचि, अंगिरस, च्यवन, जैमिनी, गौतम, रोमश,यवन आदि ने इसका अद्भुत वर्णन किया है।
मनुष्य के जीवन का रहस्य वास्तव में जैसा कि ग्रहों के अनुरूप होता है और ग्रहों के द्वारा नियंत्रित होता है।
ज्योतिष में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के निदान के लिए अलग-अलग ग्रहों को महत्व दिया गया है।
• आयुर्वेद और ज्योतिष:
आधुनिक चिकित्सा के आगमन से पहले प्राचीन काल में डाक्टर ज्योतिष और इससे संबंधित विज्ञान के अनिवार्य ज्ञान की वकालत करते थे ।
आयुर्वेद में रोगों के उपचार के अलावा अलग-अलग चंद्र दिवस पर और अलग-अलग सौर दिवस पर दवाएँ देने की परंपरा थी और इससे बीमारी से राहत मिलती थी ऐसा भी देखा गया है।
आयुर्वेद में निदान करने में मदद करने के लिए त्रिदोष का वर्णन किया गया है।
• ग्रहों के त्रिदोष इस प्रकार हैं:
ग्रह दोष
सूर्य द्विध्रुवीय
चंद्रमा वायुयुक्त और कफनाशक
मंगल द्विध्रुवीय
बुध वात, पित्तकारक और कफनाशक
बृहस्पति कफनाशक
शुक्र वात
शनि वात
इन त्रिदोषों के अलावा विभिन्न रोग राशियाँ और विभिन्न नक्षत्र भी अलग-अलग बीमारियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
शरीर के विभिन्न भागों पर इस घटना को समझने के लिए हमें जानना होगा कि मानव शरीर रचना किस प्रकार परिलक्षित होती है।
• राशि चक्र व कुंडली भाव चक्र:
ज्योतिष में शरीर और रोगों के बारे में बताया गया है।
शरीर के विभिन्न भागों को दर्शाने वाला चार्ट आगे दिया गया है:
• शरीर के अंगों का प्रतिनिधित्व करने वाले तथा चिकित्सा कारक ग्रह:
सूर्य – हृदय, नेत्र-दृष्टि, सामान्य शरीर, संविधान, सामान्य स्वास्थ्य, आँखें।
चंद्रमा – स्तन, मन, सिर, छाती, गुर्दे, शरीर में जल, हृदय।
मंगल – रक्त, मज्जा, गुप्तांग, मलाशय, नसें, सिर, स्त्री अंग, माथा, नाक, जीवन शक्ति, गर्भावस्था की समस्याएं, रक्त
दबाव, भावनाएँ, क्रोध, आक्रामकता, मासिक धर्म चक्र।
बुध – जीभ, हाथ, मुंह, छाती, रीढ़ की हड्डी, पित्ताशय, नसें, त्वचा, स्मृति।
बृहस्पति – चर्बी, गुर्दे, यकृत, जीभ, दाहिना कान, उच्च मानसिक स्तर, मधुमेह।
शुक्र – नेत्र कष्ट, कुरूपता उत्पन्न करने वाला, कुरूपता, दांतों, पैरों, बालों की समस्या, हड्डियाँ, पसीने की ग्रंथियाँ, अंग, थकान,
कमजोरी, बुढ़ापा, झुर्रियाँ, बीमारी, तीव्र दुःख उत्पन्न करने वाला, बवासीर।
शनि – सभी प्रकार के जोड़, विशेषकर घुटने की टोपी और घुटने के जोड़, गठिया, मांसपेशीय दर्द।
राहु: – खराब दांत, दांतों की समस्या, प्रतिबद्ध आत्मघाती मन, जानलेवा कृत्य, उन्मत्त उत्सर्जन अंग, जननांग।
केतु:- पैर, उत्सर्जन अंग (गुदा), नपुंसकता।
• नक्षत्र एवं शरीर के अंग:
नक्षत्रों द्वारा शासित शरीर के अंग इस प्रकार हैं:
1. अश्विनी- ऊपरी पैर
2. भरणी- निचले पैर
3. कृतिका- मुखिया
4. रोहिणी- माथा
5. मृगशिरा- नेत्र भौहें
6. आर्द्रा- आंखें
7. पुनर्वसु- नाक
8. पुष्य- मुख
9. अश्लेषा- कान
10. मघा- ठोड़ी
11. पूर्वाफाल्गुनी- दाहिना हाथ
12. उत्तरा फाल्गुनी- वामहस्त
13. हस्त- उंगलियाँ
14. चित्रा- गर्दन
15. स्वाति- छाती
16. विशाखा- फेफड़े
17. अनुराधा- पेट
18. ज्येष्ठा- पेट का दाहिना भाग
19. मूल- पेट का बायां भाग
20. पूर्वाषाढ़ा’-. पीछे का भाग
21. उत्तराषाढ़ा- कमर
22. श्रवण- ऊपरी जननांग
23. धनिष्ठा- जनन अंग
24. शतभिषा- दाहिनी जाँघ
25. पूर्वाभाद्रपद- दाहिनी जाँघ
26. उत्तराभाद्रपद- टखना
27. रेवती- पैर
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T.N.Sheshan did wonders | role of chief election commissioner | चुनाव आयोग में कमाल कर दिया था |

टीएन सेशन

:https://www.youtube.com/watch?v=2oO8HZVtFTg&t=56s

टीएन सेशन भारत सरकार में आई.ए.एस. अफसर थे जो आगे चलकर मुख्य चुनाव आयुक्त बने थे।

Former Chief Election Commissioner (CEC) of India, Tirunellai Narayana Iyer Seshan (टी.एन. शेषन) का जन्म 14 मई 1933 को प्रातः 03:30 पालघाट में हुआ था।

 

टीएन शेषन ने 1990 के दशक में आदर्श आचार संहिता को बेरहमी से लागू किया और चुनावी सुधारों का नेतृत्व किया, जब उन्होंने 12 दिसंबर, 1990 से 11 दिसंबर, 1996 तक 10वें चुनाव आयुक्त के रूप में कार्य किया।

उनकी मीन लग्न की जन्म कुंडली के दशम भाव में धनु राशि है जो अग्नि राशि है और दशम भाव का स्वामी बृहस्पति लग्न से छठे भाव में सिंह राशि में स्थित है, यह राजकीय सेवा बताता है। मंगल नवमेश होकर छठे भाव में गुरु के साथ स्थित है, यह धर्म कर्माधिपति राजयोग बनाता है। बृहस्पति के लग्नेश होने से तथा मंगल के नवमेश होने से यह लक्ष्मी योग भी बनाता है। आत्मकारक सूर्य उच्च राशिस्थ है तथा अमात्य कारक चंद्रमा दशम भाव में स्थित है।

दशमांश कुंडली के लग्न में शनि के स्थित होने से व्यक्ति में सत्ता की महत्वाकांक्षा होती है।  लग्नेश बृहस्पति तथा द्वितीयेश मंगल केतु के साथ अग्नि राशि में छठे भाव में स्थित होने से टी.एन. सेशन राजनेताओं के लिए कठोर साबित हुए। यहां द्वितीयेश और षष्ठेश का परिवर्तन भी है। उन्होंने कई चुनाव सुधार के नियम बनाए तथा भारत में चुनावी पहचान पत्र की प्रणाली प्रारंभ की। उन्होंने नियमों की पालना कठोरता से कारवाई। पंचमेश चंद्रमा के दशम भाव में स्थित होने के कारण इन्होंने अपनी इच्छानुसार नियम परिवर्तन किये। देश को उन्होंने चुनाव आयोग की शक्ति दिखा दी थी।

सन 1994 में शनि महादशा की बुद्ध अंतर्दशा में समान अधिकार प्राप्त दो और अफसर उनके साथ नियुक्त कर दिए गए कृष्णमूर्ति और गिल। इनका अधिकार बंट गया। आगे चलकर शनि महादशा की केतु अंतर्दशा इनके लिए खराब रही।

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Dhan Bhav | Second house | 2nd house in horoscope

https://www.youtube.com/watch?v=BTSsBlq6eYs&t=103s

धन भाव का प्रभाव: Effects of Dhan Bhava

  • कुंडली में 1,4,7,10 भाव को केंद्र भाव कहते हैँ।
  • कुंडली में 1,5,9 भाव को त्रिकोण भाव कहते हैं।
  • इसलिए लग्न या प्रथम भाव शक्तिशाली होता है क्योंकि यह केंद्र और त्रिकोण दोनों है।
  • केंद्र शक्ति केंद्र हैं क्योंकि प्रत्येक केंद्र भाव किसी के जीवन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा दर्शाता है।

केंद्र 1 – लग्न –स्वयं

केंद्र 4 – संपत्ति

केंद्र 7 – जीवनसाथी

केंद्र 10 – करियर, कर्म

त्रिकोण भाव 1,5,9 होते हैं और इन्हें लक्ष्मी स्थान के रूप में भी जाना जाता है।

त्रिकोण 1 – वर्तमान, स्वयं

त्रिकोण 5 – प्रारब्ध, संतान

त्रिकोण 9 – भविष्य, पिता

  • जब बृहस्पति या शुक्र जैसा एक बलवान शुभ ग्रह केंद्र या त्रिकोण में स्थित होता है तो यह उस भाव को दृढ़ता से प्रभावित करता है और अन्य केंद्र या त्रिकोण भावों को देखता है और व्यक्ति के जीवन को बढ़ाता है।
  • केंद्र भाव पहला, चौथा, सातवां और दसवां भाव हैं।इन्हें विष्णु स्थान भी कहा जाता है अर्थात जहां भगवान विष्णु निवास करते हैं।  5वां और 9वां भाव त्रिकोण भाव हैं। प्रथम भाव की गणना भी त्रिकोण में की जाती है। यह देवी लक्ष्मी का भाव है।  इसलिए जब भी केंद्र और त्रिकोण भाव के बीच शुभ संबंध होता है तो इसे भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी के बीच संबंध माना जाता है क्योंकि वे दोनों एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते हैं।  ऐसी स्थिति में कोई ग्रह बहुत अच्छी स्थिति में होगा या कोई शुभ योग बनेगा।

धन भाव का प्रभाव:

  1. यदि धन भाव का स्वामी धन भाव में हो, केंद्र में हो या त्रिकोण में हो तो वह व्यक्ति को प्रगति देता है।

यदि वह 6,8,12 भाव में हो तो आर्थिक स्थिति में गिरावट आती है।

  1. धन भाव में शुभ ग्रह धन प्रदान करता है जबकि अशुभ ग्रह धन को नष्ट करता है।
  2. यदि गुरु धन भाव का स्वामी होकर धन भाव में हो या मंगल के साथ हो तो व्यक्ति धनवान होता है।
  3. यदि धन भाव का स्वामी लाभ भाव में हो और लाभ भाव का स्वामी धन भाव में हो तो जातक को धन की प्राप्ति होती है।
  4. यदि धन भाव का स्वामी केंद्र में हो और लाभ भाव का स्वामी त्रिकोण में हो तथा गुरु और शुक्र के साथ युति हो या दृष्ट हो तो जातक धनवान होता है।
  5. यदि धन भाव का स्वामी दु:स्थान (6, 8, 12) में हो तो व्यक्ति दरिद्र होता है।
  6. लाभ भाव का स्वामी भी दु:स्थान (6, 8,12) में हो और धन भाव में किसी अशुभ ग्रह की युति हो तथा धन और लाभ भाव दोनों अस्त हो या अशुभ भावेशों के साथ हो तो जातक जन्म से ही दरिद्र होता है और जातक को अपने भोजन के लिए भी भीख मांगनी पड़ती है।
  7. धन और लाभ भाव के स्वामी अरि, रंध्र, या व्यय भाव (6, 8, 12) में स्थित हो तथा मंगल लाभ भाव में और राहु धन भाव में स्थित हो तो जातक राजदंड के कारण अपनी संपत्ति खो देता है।
  8. जब बृहस्पति लाभ भाव में हो, शुक्र धन भाव में हो और शुभ ग्रह व्यय भाव में हो तथा धनेश की शुभ ग्रह के साथ युति हो तो धार्मिक कार्यों पर धन व्यय होता है तथा व्यक्ति धर्मार्थ धन दान करता है।
  9. यदि धन भाव का स्वामी स्वराशि में हो या उच्च राशि में हो तो जातक लोगों की मदद करता है तथा प्रसिद्ध भी होता है।
  10. यदि धनेश की शुभ ग्रह के साथ युति हो और वह अच्छे वर्ग में हो तो जातक के परिवार में अनायास ही सभी प्रकार की संपत्ति प्राप्त होती है। (धनेश पारावतांश में हो या दश वर्ग में देवलोक, ब्रह्मलोक, शक्रवाहन, या श्रीधाम अंश में हो)
  11. यदि धन भाव का स्वामी बल से संपन्न हो तो जातक सुंदर आंखों वाला होता है। कहा गया है कि ग्रह अरि, रंध्र या व्यय भाव (6, 8, 12) में हो तो आंखों में रोग या विकृति होती है।
  12. यदि धन भाव और उसका स्वामी पाप ग्रहों के साथ युति में हो तो जातक असत्य बोलने वाला तथा वायु रोग से पीड़ित होता है।

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