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Tantra | black magic | sadguru | shiva | तंत्र
तंत्र शब्द का अर्थ एक ऐसी प्रक्रिया का वर्णन करना है जिसके माध्यम से शरीर को सभी प्रकार की बीमारियों और अपरिहार्य बुराइयों से बचाया जा सकता है। प्राचीन हिंदू ग्रंथों में तंत्र का पहला संदर्भ अथर्ववेद के नरसिंह उपनिषद में मिलता है।
तांत्रिक साधनाएं तुरंत प्रभाव पैदा करती हैं और ऐसा माना जाता है कि इसके माध्यम से असंभव को भी प्राप्त किया जा सकता है। ऐसा माना जाता है कि तंत्र शास्त्र (तंत्र विज्ञान) भगवान शिव के मुख से उत्पन्न हुआ है और कुल 64 प्रकार का है। तंत्र के कुछ उपतंत्र या छोटे संस्करण भी हैं। तंत्र में ऊर्जा के दश रूपों (काली, तारा, षोडसी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला) की पूजा अत्यधिक प्रचलित है।
तन्त्र साहित्य अत्यन्त विशाल है। प्राचीन समय के दुर्वासा, अगस्त्य, विश्वामित्र, परशुराम, बृहस्पति, वशिष्ठ, नंदिकेश्वर, दत्तात्रेय महर्षि लोमश ऋषियों ने तन्त्र के अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया।
ऐतिहासिक युग में शंकराचार्य के परम गुरु गौडपादाचार्य का नाम उल्लेखनीय है। उनके द्वारा रचित ‘सुभगोदय स्तुति’ एवं ‘श्रीविद्यारत्न सूत्र’ प्रसिद्ध हैं। मध्ययुग में तांत्रिक साधना एवं साहित्य रचना में विद्वानों का प्रवेश हुआ था।
लक्ष्मणदेशिकेन्द्र: ये शादातिलक, ताराप्रदीप आदि ग्रथों के रचयिता थे।
आदि शंकराचार्य: वेदाङ्गमार्ग के संस्थापक सुप्रसिद्ध भगवान शंकराचार्य वैदिक संप्रदाय के अनुरूप तांत्रिक संप्रदाय के भी उपदेशक थे।
परम्परा से शंकराचार्य के रचित प्रसिद्ध तांत्रिक ग्रंथ इस प्रकार हैं-
1-प्रपंचसार,
2-परमगुरु गौडपाद की सुभगोदय स्तुति की टीका,
3-ललितात्रिशतीभाष्य,
4- आनंदलहरी अथवा सौंदर्यलहरी नामक स्तोत्र।
पृथिवीधराचार्य अथवा ‘पृथ्वीधराचार्य: इन्होंने ‘भुवनेश्वरी स्तोत्र’ तथा ‘भुवनेश्वरी रहस्य’ की रचना की थी।
चरणस्वामी, सरस्वती तीर्थ, राघव भट्ट, पुण्यानंद, अमृतानंदनाथ, त्रिपुरानन्दनाथ, सुन्दराचार्य, विद्यानंदनाथ, नित्यानन्दनाथ, सर्वानन्दनाथ, निजानंद प्रकाशानंद मल्लिकार्जुन योगीभद्र, ब्रह्मानन्द, पूर्णानन्द, देवनाथ ठाकुर तर्कपंचानन, गोरक्ष, सुभगानन्द नाथ, कृष्णानन्द आगमबागीश, आगमाचार्य गौड़ीय शंकर, भास्कर राय, प्रेमनिधि पन्थ, उमानन्द नाथ, शंकरानन्द नाथ, रामेश्वर, अप्पय दीक्षित, माधवानन्द नाथ, क्षेमानन्द, गीर्वाणेन्द्र सरस्वती, रघुनाथ तर्कवागीश, महादेव विद्यावागीश, यदुनाथ चक्रवर्ती, नरसिंह ठाकुर, गोविन्द न्यायवागीश, काशीनाथ तर्कालङ्कार, शिवानन्द गोस्वामी आदि।
तंत्र को सात मुख्य ‘आचार’ या अनुशासनों के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है:
तंत्र में तीन प्रकार के भक्त होते हैं- पशु (पशु या बंधन में पड़ा हुआ), वीर और दिव्य।
पशु भाव:
1. वेदाचार
2. वैष्णवाचार
3. शैवाचार
4. दक्षिणाचार
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वीर भाव:
5. वामाचार
6. सिद्धांताचार
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दिव्य भाव:
7. कोलाचार।
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शाक्तागम ग्रन्थों यथा विश्वसारतंत्र, महाचीनाचार तंत्र, कुलार्णव तंत्र, महानिर्वाण तंत्र, समयाचार तंत्र तथा सर्वोल्लास तंत्र में विभिन्न भावों तथा आचारों के सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक लिखा गया है। कुलार्णव तंत्र के अनुसार –
‘‘सर्वेम्यश्चोत्तमा वेदा-वेदेम्यो बैष्णवं परम
वैष्णवादुत्तमं शैवं-शैवादक्षिण मुत्तमम्
दक्षिणात् उत्तमं वामं-वामात् सिद्धान्तमुत्तमम्
सिद्धान्तात् उत्तमं कौलं-कौलात् परतरं नहि।।’’
–कुलार्णव तंत्रम्, उल्लाश 2, श्लोक 7,8
……….
यह श्लोक विभिन्न धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं की श्रेष्ठता को दर्शाता है। इसमें कहा गया है कि:
• सब से उत्तम वेदाचार है।
• वेदाचार से उत्तम वैष्णवाचार है।
• वैष्णवाचार से श्रेष्ठ शैवाचार है।
• शैवाचार से श्रेष्ठ दक्षिणाचार है।
• दक्षिणाचार से श्रेष्ठ वामाचार है।
• वामाचार से श्रेष्ठ सिद्धांताचार है।
• सिद्धांताचार से श्रेष्ठ कौलाचार है।
इस प्रकार, यह श्लोक विभिन्न परंपराओं की महत्ता को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करता है।
इन सात आचारों का संक्षिप्त विवरण:
1. वेदाचार:
इस आचार में भक्त वेदों और अन्य वेदमूलक शास्त्रों जैसे स्मृतियों, पुराणों आदि में बताए गए तरीकों का पालन करते हुए आराध्य देवता की सकाम पूजा (कुछ विशिष्ट लक्ष्यों को प्राप्त करने की इच्छा से) करता है।
2. वैष्णवाचार:
इस आचार में साधक वेदाचार में बताए गए नियमों का पालन करता है और भगवान विष्णु की पूजा करता है। वह अपने सभी कर्म भगवान विष्णु को समर्पित करता है और हर वस्तु में नित्य भगवान विष्णु के दर्शन करता है। इस आचार में साधक को शुद्धता-अशुद्धता के कुछ सख्त नियमों का पालन करना होता है।
3. शैवाचार:
इस आचार में भक्त शिव-शक्ति की पूजा करने के लिए वेदाचार नियमों का पालन करता है। यहाँ भक्त हर वस्तु में शिव को देखता है।
4. दक्षिणाचार:
प्राचीन काल में दक्षिणामूर्ति मुनि ने इस मार्ग को अपनाया था और इसीलिए इसे यह कहा जाता है।
दक्षिणाचार का अर्थ है अनुकूल आचरण। दूसरे शब्दों में, आचरण का पालन करने से देवता और पितृ हमारे अनुकूल हो जाते हैं, देवी प्रसन्न होती हैं और हमारे अनुकूल हो जाती हैं, यही दक्षिणाचार है।
इस आचार में, वेदाचार के नियमों का पालन करते हुए, भक्त देवी की पूजा करता है।
इन चारों आचारों तक पशु भाव माना गया है।
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